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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

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[ १४ ]
का उपजीव्य वेद का ब्राह्मण भाग है, और उत्तर मीमांसा का उपजीव्य उपनिषद् है ।
यह सत्य है कि समस्त वेद का प्रामाण्य मीमांसा ने स्वीकार किया है । पूर्वमीमांसा,
कर्ममीमांसा, कर्मकाण्ड या साधन शास्त्र है । साधना का उपकरण स्थूल द्रव्य अवश्य है,
किन्तु उसका लक्ष्य स्वर्ग या अध्यात्म चेतना की भूमि है । द्रव्ययज्ञ या ज्ञानयज्ञ ही
इसकी प्राप्ति का साधन है । किन्तु इस स्थूल के साथ सम्बद्ध साधना का सूक्ष्मतम
उपकरण है । मनोमय साधना की विवृत्ति और आलोचना से वैदिक ऋषि की अध्यात्म
दर्शन की पूर्ण छवि सुलभ होती है ।
इसमें विप्रतिपत्ति का अवसर ही कहाँ है कि वेदमन्त्रों की रक्षा करने का शुद्ध
प्रयास कर्मकाण्ड में किया गया है, आत्मचिन्तन में नहीं । पूर्वमीमांसा की अवतारणा
वेद की रक्षा के लिए ही है, और उसी के आधार पर वेद का रहस्य अवगत किया
जा सकता है । पूर्वमीमांसा ब्राह्मण पर अवस्थित है ।
आर्य समाजियों ने भी वेद की व्याख्या करने का असफल प्रयास किया था, किन्तु
वह सम्प्रदाय में आबद्ध होने के कारण उसमें ऋषिधारा का पल्लवित रूप उपलब्ध नहीं
हो सका, अतः मनन की भूमि पर तर्क प्रतिष्ठित यह व्याख्या नास्तिक से बहिर्भूत नहीं
है । आगन्तुक सार्वज्ञ्य का आरोप कर प्रस्तुत वेदार्थ में कभी भी अपौरुषेय निरतिशय
सहज सर्वज्ञ की व्याख्या की उपलब्धि नहीं हो सकती है ।
इसी क्रम में वेद व्याख्या के लिए वेदाङ्ग का भी अवसर प्राप्त होता है । इन
वेदाङ्गों में निरुक्तकार का विशेष महत्त्व है । यद्यपि निरुक्त में आनुपूर्वी व्याख्या नहीं
है, तथापि अनेक मन्त्रों की व्याख्या उपलब्ध होती है यह व्याख्या कर्मपरक होते हुए भी
विद्युत्प्रकाश के समान अनेक रहस्यों का भी उद्घाटन करती है, इतना ही नहीं वेद की
विभिन्न धाराओं का उल्लेख भी उपलब्ध होता है । यास्क इन व्याख्याकारों में अन्तिम
आचार्य हैं । इसके साथ ही मध्ययुग के शेष भाग में सायणाचार्य उपलब्ध होते हैं,
जिनकी समस्त वेद की आनुपूर्वी व्याख्या मिलती है । किन्तु इनकी व्याख्या आकस्मिक
नहीं है, वरन् प्राचीन धारा का क्रमानुवर्तन है, जो आज भी व्याख्यान क्रम से अनुवर्तित
है । सायण ने कर्मपरक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए भी अन्य धाराओं को भी उदात्त
उदार रूप में परिगृहीत किया है । इस प्रकार यह अवगत होता है कि वेद काल से ही
ब्राह्मण, निरुक्त, मीमांसा आदि के क्रम में अविच्छिन्न अक्षुण्ण वेद की व्याख्या प्रवाहित
हो रही है, किन्तु, मध्य में विच्छेद होते हुए भी ब्राह्मण्यधारा और सायणधारा में विशेष
भेद नहीं है । यास्क की परम्परा से वेद के रहस्यार्थ के उद्बोधन की परम्परा भी
चलती रही है । देवताकाण्ड में देवतत्त्व की आलोचना निगूढ रहस्य की ओर इङ्गित
करती है । जिसे मीमांसा ने मन्त्रमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया, किन्तु, देवतत्त्व अचेतन
तत्त्व नहीं है । अलौकिक अनुभव का फल होने से अध्यात्म व्यञ्जना से दूर रहना
सम्भव ही नहीं है । कर्म के आधार पर मीमांसा शास्त्र पूर्व और उत्तर रूप में उपलब्ध