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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

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व्यक्ष' । याज्ञवल्क्य के इस उपदेश में भारतीय जनता का जीवन-प्रवाह आशा आकांक्षा
का पर्यवसान परिलक्षित होता है । 'एतावदरे खल्वमृतत्त्वम्' । आत्मा का श्रवण मनन
और निदिध्यासन ही मोक्ष का एक मात्र साधन है । इस उपदेश के व्याख्यान में ही
भारतीय दर्शन की असंख्य धाराएँ प्रवाहित हैं । आत्मतत्त्व का अपरोक्षावभासन ही
मोक्ष है, और इसी आत्मतत्त्व की चिन्मय भूमि में अवतीर्ण होना स्वर्ग है । इस आत्म-
तत्त्व के निदिध्यासन या उपासना में प्रवृत्त होकर समस्त जगत्प्रपञ्च की आत्मव्यतिरिक्त
प्रतीति ही सुलग रहती है । इस अवस्था का अवलम्बन कर ही कर्ममीमांसा की प्रवृत्ति
मानी जा सकती है, किन्तु, कुमारिल का मङ्गलाचरण भी इस ज्ञान और कर्म के
समन्वय भावना का परिचायक है—
विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्य-चक्षुषे ।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्द्धधारिणे ॥
शुक्ल यजुर्वेद का प्रवर्त्तक आचार्य याज्ञवल्क्य ही ज्ञान धारा का भी प्रवर्त्तक है,
अतः ज्ञानवासना और कर्मवासना दोनों चरम में उपनिषद् से प्राप्त हो या मन्त्र से भूमि
एक ही है । मन्त्र का मीमांसा से सम्बन्ध है । एक धातु से दोनों ही निष्पन्न हैं । मन्त्र
शब्द एवं दीप्त्यात्मक देवाविष्ट मनन का स्वतः विच्छुरण है और संविद् का बोध
करने की प्रचेष्टा ही मीमांसा है । मन्त्र के रहस्य को स्वतः सिद्ध मानकर उसके प्रतिपाद्य
कर्मचोदना और ज्ञान प्रेरणा को सुसम्बद्ध रूप देने की चेष्टा से ब्राह्मण एवं मीमांसा का
आविर्भाव है । ब्राह्मण में वेदार्थ की आदि मीमांसा है, जिसमें कर्ममीमांसा एवं ब्रह्म-
मीमांसा भी प्राप्त होती है । मीमांसा की धारा अक्षुण्ण प्रवाहित होने पर भी इसे
सुसम्बद्ध रूप जैमिनि ने दिया है । कालक्रम में मीमांसक के मतवाद का एक विशिष्ट
आकार तार्किक बुद्धि की देन है । वैदिक साहित्य में अध्यात्म साधना का जो स्वरूप
प्राप्त होता है, उसके मूल में शब्दमूर्ति देववाद है । देववाद की भित्ति श्रद्धा है और श्रद्धा
मानव चित्त की मौलिक वृत्ति अतीन्द्रिय पदार्थ है । इसी के सन्निश्चय में एक अन्य वृत्ति भी
प्राचीन काल से वर्त्तमान है, जिसको ऊह या बाद की तर्क संज्ञा हो गई है । तर्क की
दृष्टि प्रत्यक् वृत्त है और उसके मूल में जिज्ञासा है । साधना के परिणाम स्वरूप आत्म-
वाद है । देवता और आत्मा दोनों ही अतीन्द्रिय है । आत्मदर्शन या देवदर्शन दोनों ही
अतिप्राकृत हैं । आत्मवाद संशय को निमित्त रूप से मानता है । देववादी या आत्मवादी
दोनों ही सार्वभौम को ही प्राप्त करता है । वेद की भाषा में एक आवेग कल्पित विप्र है
और एक पौरुषदृप्त नर है । एक के पास प्राप्ति का साधन श्रद्धा है और एक के पास
तर्क या बुद्धि है ।
जिस वाणी की सङ्गति के साधन में मीमांसा की समस्त शक्ति नियोजित रहती है,
वही वेद, श्रुति या मन्त्र है । समग्र वेद की मीमांसा आज भी दुर्लभ है । पूर्वमीमांसा
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