मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in contextनाथ-प्रभाव द्योतक पद २६६
१०
धूतारा जोगी एकर सूं हँसि बोल ।
जगत बदीत करी मनमोहना, कहा बजावत ढोल ।
अग भभूति गले मृगछाला, तू जन गुढिया खोल ।
सदन सरोज बदन की सोभा, ऊभी जोऊँ कपोल ।
सेली नाद बभूत न बटवो, अजूं मुनि मुख खोल ।
चढती बैस¹ नैण अनियाले², तू घूरि घरि मत डोल ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी,चेरी भई बिन मोल ॥५४२॥
११
धूतारा जोगी एक बेरिया मुख बोल रे ।
कान कुडल गल बीच सेली, अवतेरी मुनि मुख खोल रे ।
रास रच्यो बसी बट जमुना, ता दिन कीनी कोल रे ।
पूरब जनम की मैं हूँ गोपिका,अधबिच पड गयो झोल रे ।
जगत बदी ते तुम करो मोहन, अब क्यूँ बजाओ ढोल रे ।
तेरे कारण सब जग त्याग्यो, अब मोहैं कर सो लोल रे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चैरी भई बिन मोल रे ॥५४३॥†
उपर्युक्त दोनो पदो की प्रथम पक्तियो मे गहरा साम्य हैं।
द्वितीय पद की अभिव्यक्ति कही कही असगत और अर्थहीन हैं।
प्रथम पद पर नाथ-परम्परा का विशेष प्रभाव है और दूसरे पद
पर वैष्णव-परम्परा का गहरा प्रभाव है। प्रथम पद मे तो आराध्य
“धूतारा जोगी” से “एकर सूं हँसि बोल” की प्रार्थना है और
एतदर्थ प्रयास भी है और द्वितीय पद मे पूर्व जन्म के ‘कोल’ की याद
दिलाई जा रही है। “पूरब जनम की मैं हूँ गोपिका” जैसी
अभिव्यक्ति वैष्णव-प्रभाव द्योतक अन्य पदो में भी मिलती है।*
इस पद की भाषा पर भी खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है।
१ वयस, २ तीखे ।
- देखे, मीराँ, एक अध्ययन,