मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in context२९८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पाठान्तर १,
जोगिया दरस दीजो राज, बाँह गह्मां की लाज।
लोक लाज बिसारि डारिस, छाँड्यो जग उपदेस।
विरह अगिन मे प्राणि दाझै, सुणि लिज्यो आदेस।
पाँच मुद्रा भाव कथा, नष सिष साजे साज।
जोगिण होय जग ढूँढसूँ, म्हारी घर घर फेरी आज।
दरद दिवानी'तन जाणि आपनी, मिलिया राम दयाल।
मीराँ के मन आनन्द उपज्यौ, रोम रोम खुसियाल।†
दोनो ही पाठो मे अन्तिम दोनो पक्तियाँ मिलन और आनन्द
को ही अभिव्यक्त करती है, जब शेष सम्पूर्ण पद से वियोग और
प्रतीक्षा के साथ ही साथ जोगी द्वारा प्रदर्शित अवहेलना के प्रति एक
गहरी शिकायत भी लक्षित होती है। शिकायत की यह अभिव्यक्ति
नाथ-प्रभाव द्योतक अधिकांश पदो की विशेषता है।
८
तेरो मरम नहि पायो रे जोगी।
आसण माँडि गुफा मे बैठ्यो, ध्यान हरि को लगायो ।
गल बीच सेली, हाथ हॉजरियो, अग भभूत रमायो।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, भाग लिख्यो सो ही पायो ।।५४०।।
९
कोई दिन याद करोगे, रमता राम अतीत ।
आसण माँडि अडिग होय बैठ्या, याही भजन की रीत।
मै तो जाणू जोगी सग चलेगा, छोड़ि गया अधबीच।
आत न दीसे, जात न दीसे, जोगी किस का मीत।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, चरण न आवै चीत ।।५४१।।
पद की प्रथम पंक्ति की भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट
है। इस पद और पद सं० ८ की द्वितीय पंक्ति का भाव और भाषा-
साम्य विचारणीय है। इस पद की द्वितीय पंक्ति की अभिव्यक्ति
"याही भजन की रीत" मे आराध्य के प्रति बड़ा मार्मिक व्यग है।