मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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छापा तिलक सवारो, पहिरो चोलना हो राज।
जमना के तट धेनु चरावै, बेसी मे कछु अचरज गावै।
नई नई तान सुनावै, छाछ मछोलना जी राज।
म्हारी प्रीत तुम्ही सो लागी, कुल मरजाद सब ही हम त्यागे।
मीराँ के प्रभु गिरधारी, बन बन डोलना हो राज ॥५००॥†
इस पद को भी स्पष्ट ही दो भागो मे बाँटा जा सकता है। “थाने
कुब्जा हो ····चोलना हो राज।” प्रथमाशं है। बीच की दो पक्तियो
“जमुना के तट ····छाछ मछोलना जी राज” का पूर्वा श
से कोई सबन्ध नही प्रतीत होता। “छाछ मछोलना जी राज” जैसी
अभिव्यक्ति भी निरर्थक ही प्रतीत होती है। फिर पद की आठवी
पक्ति का सबन्ध पूर्वार्द्ध से ही जुडता है, जब कि अन्तिम पक्ति सम्पूर्ण
पद से भिन्न पड़ती है। अन्तिम पक्ति मे “मीराँ क प्रभु गिरधारी”
जैसा प्रयोग भी सर्वथा नूतन है।
पद की भाषा मे राजस्थानी और भोजपुरी का सम्मिश्रण हुआ है,
जिसका कारण एकमात्र गेय परम्परा ही हो सकती है।
पाठान्तर १,
थारे कुब्जा ही मनमानी, म्हाँसूँ अनबोलना हो राज।
हम से कहै सुहाग उतारो, दृग अंजन सब ही धो डारो।
माथे तिलक चढावो, पहरो चोलना हो राज।
हमरी कही बिषै सम लागै, घर घर जाय भवर रस पागै।
उन्ही के सग रहना, हँसना बोलना हो राज।
वृन्दावन मे धेनु चरावै, बसी मे कछु अचरज गावै।
बाकी तान सनावै, छतिया छोलना१ हो राज।
हमरी प्रीत तुम्ही सग लागे, लोक लाज सब कुल को त्यागी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर, बन बन डोलना हो राज।†
१ छीलना, जलाना।