मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in contextवैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २२१
मत्र ने जन्त्र कछुए न जाणुं बेद पढ्यो न गै काशी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल की हूँ दासी ॥३६६॥
१४
कोई ना जाने हरिया तारी गति कोई ना जाने।
मिट्टी खात मुख देखा जसोदा चोदह भुवन भरिया।
पडी पाताल काली नागनाथ्यूँ सूरन शशी डरिया।
डूबत ब्रज राख लियो है कर गोबरधन धरिया।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर सरने आयो सो तरिया ॥३६७॥
१५
चरण रज महिमा मे जानी।
ये ही चरण से गगा प्रगटी भगीरथ कुल तारी।
ये ही चरण से विप्र सुदामा हरि कचन धाम दीनी।
ये ही चरण से अहिल्या उधारी गौतम की पटरानी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर ये ही चरण कमल मे लपटानी ॥३६८॥
१६
मेरो मन हर लिनो राजा रण छोड़, राजा रण छोड़, प्यारा रंगीला रणछोड़
केशव माधव श्री पुरुषोत्तम कुबेर कल्याण कीजो।
शंख चक्र गदा पद्म विराजे, मुख मुरली घन घोर।
मोर मुकुट सिर छत्र विराजे, कुण्डल की छब ओर।
आस पास रतनांगर सागर, गोमती जी करे कलोल।
धजाँ पताका बहुत्याँ फरके, झालर फरत झकझोर।
सब भगत के भाग्य ही प्रकटे, नाम धर्यो रणछोर।
जे कोई तेरो नाम सुनावे, पावे युगल किशोर।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर नागुण कर ग्रहो नन्द किशोर ॥३६९॥