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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

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DevanagariRajasthanipublished365 pages

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Page 272

२१८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
४
राम नाम रस पीजै मनुआ, राम नाम रस पीजै।
तज कुसग सतसग बैठ नित, हरि चरचा सुन लीजै।
काम क्रोध मद लोभ मोहं कूँ, चित से बहाय दीजै।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, ताही के रग भीजै ॥३५७॥†
उपर्युक्त पद मे "राम" गिरधर नागर" दोनो ही सम्बोधन का
प्रयोग हुआ है यह विचारणीय् है।
५
मेरा बेडा लगाय दीजो पार, प्रभु अरज करु छूूँ।
या भव मे मै बहुत दुख पायो, ससा सोग निवार।
अष्ट करम की तलब लगी है, दूर करो दुख पार।
यो ससार सब बह्यो जात है, लख चौरासी धार।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आवागमन निवार ॥३५८॥†
प्रथम पक्ति मे "करु छूूँ" क्रिया का प्रयोग शेष पद की शुद्ध ब्रज
भाषा से सर्वथा भिन्न पडता है।
६
कृष्ण करो जजमान, प्रभु तुम कृष्ण करो जजमान।
जाकी कीरति बेद बखानत, साखी देते पुरान।
मोर मुकुट पीताम्बर शोभत, कुडल झलकत कान।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, दे दर्शन को दान ॥३५९॥†
पद की प्रथम पक्ति सर्वथा निरर्थक है। शेष पद वर्णनात्मक
है। तृतीय पक्ति अन्य पदो मे भी हूबहू इसी रूप मे मिल जाती है।
७
धन आज की घरी, सतसंग मे परी।
श्री मदभागोत श्रवण सुनी, रसना रटत हरी।