मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in contextवैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २१७
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
बसो मोरे नैनन मे नन्दलाल।
मोहनी मूरत सावरि सूरति, बनै नैन विसाल।
अधर सुधारस मुरलि राजति, उर बैजन्ती माल।
छुद्र घटिका कटि तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल।
मीराँ प्रभु सत सुखदाई, भक्त वछल गोपाल ॥३५४॥
पद की भाषा शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा है। यह देखते हुए अन्तिम
पंक्ति मे व्यवहृत "बछल" शब्द अनुपयुक्त ठहरता है "बछल" शब्द
के कारण लय भग भी होता है। अत "बछल" के बदले "वत्सल" का
प्रयोग ही अधिक युक्तियुक्त होगा।
२
मेरो मन राम ही राम रटै रे।
राम नाम जप लीजै प्राणी, कोटिक पाप कटै रे।
जनम जनम के खत जू पुराने, नामही लेत फटे रे।
कनक कटोरे इम्रिता भरियो रे, पीवत कौन नटै रे।
मीराँ कहै प्रभु हरि अविनासी, तन मन ताहि पटै रे ॥३५५॥†
पद की तीसरी पंक्ति का शेष पद से पूर्वापर संबंध नही
बैठ रहा है।
३
नैया मेरी हरी तुम ही खवैया, तुमरी कृपा ते पार लगैया।
गहरी नदिया नाव पुरानी, पार करो बलभद्र जू के भैया।
अजमिल गज गनिका तारी, शबरी अहिल्या (द्रोपदी) लाज रखैया।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बार बार तुमरें बाल गैया।
॥३५६॥†
चतुर्थ पंक्ति का उत्तरार्द्ध अशुद्ध है।
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