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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

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DevanagariRajasthanipublished365 pages

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Page 252

१६६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
भाई छोड़चा, बन्धु छोड़चा, छोड़चा सगासोई ।
साध संग बैठि बैठि, लोक लाज खोई ।
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई ।
प्रेम नीर सीच सीच, विष बेलि धोई ।
दधि मथ घृत काढ़ि लियो, डार दियो छोई ।
राणा विष को प्यालो भेजियो प्रिय मगन होई ।
अब तो बात फैलि गई, जानै सब कोई ।
मीरां राम लगन लगी, होनी होय सो होई ॥३१७॥
इस पाठ विशेष मे भी प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त "राम" के बदले
गिरधर नागर का भी प्रयोग मिलता है। "गिरधर नागर" पाठ ही
विशेष रूपसे प्रसिद्ध है क्योकि प्रचलित मान्यतानुसार मीराँ कृष्ण की
की ही उपासिका मानी जाती है ।
२७
गोविन्द सूं प्रीत करत, तबही क्यूँ न हटकी ।
अब तो बात फैल गई, जैसे बीज बटकी ।
बीच को विचार नाहि, छाँय परी तटकी ।
अब चूकौ तो ठौर नाहि, जैसे कला नट की ।
जल के बुरी गाठ परी, रसना गुन रटकी ।
अब तो छुड़ाय हारी, बहुत बार झटकी ।
घर घर मे घोल मठोल बानी, घट घट की ।
सब ही कर सीस धरि, लोक लाज पटकी ।
मद की हस्ती समान फिरत, प्रेम लटकी ।
दासी मीराँ भक्ति बुन्द, हिरदय बिच गटकी ॥३१८॥
यह पद भी सूरदास जी के पद का ही गेय रूपान्तर भर प्रतीत
होता है। (देखिये मीराँ, एक अध्ययन) ।