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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

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DevanagariRajasthanipublished365 pages

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Page 251

“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६५
आप ही आप पुजाय कै रे, फूलै अंग न समात ।
अभिमान टीला किए बहु, कहु जल कहां ठहरात ।
जा तेरे हिय अन्तर की जाणे, तासो कपट न बनै ।
हिरदे हरि को नाव न आवे, मुख ते मणिया गणै ।
हरि हितु सो हेत कर, संसार आसा त्याग ।
दासी मीराँ लाल गिरधर, सहज कर वैराग ।॥३१५॥
इस पद पर सन्त-मत का प्रभाव बहुत स्पष्ट है।
२५
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बन्धु, अपना र्नहि कोई।
छाडि दई कुल की कान, क्या करेगा कोई।
सतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई।
चुनरी के किए टूक टूक, ओढ़ लीन्ही लोई।
मोती मूँगे उतार, बन माला पोई।
अंसुवन जल सीचि सीचि, प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेल फैलि गई, आनन्द फल होई।
दूध की मथनिया, बडे प्रेम से बिलोई।
माखन जब काढि लियो, छांछ पिये कोई।
आई मै भक्ति काज, जगत देखि रोई।
दासी मीराँ गिरधर प्रभु, तारो अब मोहि। ॥३१६॥
“दासी मीराँ गिरधर प्रभु” प्रयोग इस पद की विशेषता है।
२६
मेरे तो राम नाम, दूसरा न कोई।
दूसरा न कोई, सकल लोक जोई।