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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

DevanagariRajasthanipublished365 pages

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Page 143

वियोगाभिव्यक्ति ८५
३२
कोई कहियो रे प्रभु आवन की।
आवन की मन भावन की, कोई।
आप नही आवै, लिख नहीं भेजै बाण पड़ी ललचावन की।
एक दोइ नैना कह्यो नही मानै, नदिया बहै जस सावन की।
कहा करूं कछु बस नही मेरो, पांख नही उड जावन की।
मीराँ कहै प्रभु कबर मिलोगे, चेरी भई हू तेरे दावन की।।१४७।।†
उपर्युक्त तीनों पदों मे कुछ ऐसा भाव साम्य है कि तीनों ही पद
एक दूसरे के गेय रूपान्तर प्रतीत होते है। "भनक सुनी हरि आवन की"
भावना की ही पुनरुक्ति हुई है। "सुनिहौ मै हरि आवन की आवाज"
(पद स० ३१) और "कोई कहियो प्रभु आवन की" (पद स० ३२)
मे प्रथम दो पदो मे वर्षा और श्रावण का वर्णन है। तीसरे पद की
अभिव्यक्ति के अनुसार मीराँ की आँखो पर ही श्रावण छाया हुआ
है। अन्तिम पद (स० ३२) चन्द्र सखी के निम्नांकित पद के कुछ
विशेष निकट पडता है।
'चन्द्रसखी' के नाम पर भी एक ऐसा ही निम्नांकित पद पाया
जाता है। निश्चित रूपेण यह कहना कि पद मौलिक रूपेण किसका है,
अति दुरूह है। फिर भी, मीराँ के पदो के साथ हुए भाव और भाषा
के अन्तर पर विचार करते हुए यह अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि
पद मौलिक रूपेण 'चन्द्रसखी' का ही हो।
कोई कहियो रे मोहन आवन की।
आप तो जाय द्वारिका छाये, हम को जोग पठावन की।
आप न आवै, पतियाँ न भेजै, बात करै ललचावन की।
ए दोऊ नैण कहियो न मानै, घटा उमड़ रही सावन की।
दिल चाहत उड जाय मिलूँ, पर पाख नही उड़ जावन की।
चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, पर कमल लपटावेन की।
पद स० ३२ से इस पद का बहुत अधिक साम्य है।