मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in context८४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
प्रथम पंक्ति मे "झरी" प्रयोग के बदले "डरी' प्रयोग भी
मिलता है।
२९
सावण दे रह्यो जोरा रे, घर आओ जो स्याम मोरा रे।
उमड घुमड चहु दिसि से आया, गरजत है घनघोरा रे।
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल कर रही सोरा रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, ज्यो वारु सो हो थोरा रे ॥१४४॥
३०
बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की।
सावन मे उमड्यो मेरो मनवां, भनक सुनी हरि आवन की।
उमड घुमड चहु दिसि ते आयो, दामिनी दमक झर लावन की।
नन्हीं नन्ही बूँदन मेहा बरसे, सीतल पवन सोहावन की।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आनन्द मगल गावन की ॥१४५॥
पदाभिव्यक्ति मे विरोधाभास है। पहले की पक्तयों से विरोध
और अन्तिम पक्तियो से आनन्द ही लक्षित होता है।
३१
सुनी हो मै हरि आवन की आवाज।
म्हैल चढि चढ़ि जोऊं सजनी, कब आवै महाराज।
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल मधुरै साज।
उमग्यो इन्द्र चहु दिसि बरसे, दामिणी छोड़ी लाज।
धरती रुप नवा नवा धरिया, इन्द्र मिलण के काज।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बेग मिलो महाराज ॥१४६॥