मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in context५८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
थे तो पलक उघाडो दीनानाथ, मे हाजिर नाजिर कद की खटी।
सोजनियाँ दुसमण होय बैठ्या, सब ने लगूँ कड़ी।
तुम बिन साजन कोई नही है, डिगी नाव मेरी सपद अडी।
वाण विरह का लाग्या हिये मे, भूलूँ न एक घडी।
पत्थर की तो अहल्या तारी, बन के बीच पडी।
कहा बोझ मीराँ के कहिए, सौ पर एक घडी। ॥८२॥
कही कही इसी पद के साथ निम्नांकित दो पंक्तियाँ और भी पायी
जाती हे।
'गुरु रैदास मिले मोहिं पूरे, धुर से कलम भिडी।
सतगुरु सैन दई जब आकें, जोत से जोत रली।
पदाभिव्यक्ति स्पष्ट नही है। पूर्वापर सबध और अर्थ संगति
का भी अभाव है। साथ ही प्रथम पंक्ति और शेष पद की अभिव्यक्तियो
मे गहरा विरोध भी है। सतमत का प्रभाव विशेष रूपेण लक्षित हो
उठता है।
२
राम मिलण के काज सखी, मेरे आरति उर मे जागी री।
तलफत तलफत कल न परत है, बिरह आणि उर लागी री।
निस दिन पथ निहारूँ पीव को, पलक न पल भरी लागी री।
पिव पिव मे रटूँ रातदिन, दूजी सुध बुध भागी री।
बिरह भवग¹ मेरो उस्यो है कलेजो, लहरि हलाहल जागी री।
मेरी आरति मेटि गुँसाई, आई मिलौँ मोहि सागी² री।
मीराँ व्याकुल उकलाणी³, पिया की उमंग अति लागी री।
॥८३॥
१ भुवग-साँप, २ स्वयम्, ३ व्याकुल।