मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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चर्चा की गई है। इसके पश्चात् मनुष्य के अनुकूल स्थान, मण्डप का प्रयोजन, मण्डप
के नाम, उसके प्रमाण, स्तम्भमान, अधिष्ठान की ऊँचाई, उपपीठ की ऊँचाई, मण्डप
के लक्षण, मण्डप का अर्थ, प्रपालक्षण तथा रङ्गलक्षण वर्णित है। मण्डप के प्रकारों
में मालिका, मेरुक, विजय, सिद्ध एवं यागमण्डप वर्णित हैं। यागमण्डप के सन्दर्भ
में कुण्ड के लक्षण तथा उसके भेदों—योनिकुण्ड, अर्धचन्द्र, द्व्यस्र, वृत्त, षट्कोण,
पद्म, अष्टास्र, सप्तास्र तथा पञ्चास्र का निरूपण किया गया है। इसके अनन्तर सिद्ध,
पद्मक, भद्रक, शिव, वेद, अलंकृत, दर्भ, कौशिक, कुलधारण, सुखाङ्ग, सौम्य, गर्भ,
माल्य, माल्याद्भुत, धन, सुभूषण, आहल्य, सुगाख्य, कोण, खर्वट, श्रीरूप, मङ्गल,
मार्ग, सौभद्र, सुन्दर, साधारण, सौख्य, ईश्वरकान्त, श्रीभद्र तथा सर्वतोभद्र आदि
मण्डपों का लक्षणसहित प्रमाणवर्णन किया गया है। मण्डप के मुखभाग की लम्बाई
के पश्चात् पुनः मण्डपों के भेद, जलक्रीड़ा-मण्डप, मण्डप के अनुकूल वृक्ष, मुखमण्डप,
मण्डप का गर्भस्थान, अलिन्द्र, मालिका आदि निरूपित हैं।
सभा-विधान के प्रसंग में सभाओं के भेद एवं कूटलक्षण वर्णित हैं। सभाभेदों में
मल्लवसन्त, पञ्चवसन्तक, एकवसन्तक, सर्वतोभद्र, पार्वतकूर्म, माहेन्द्र, सोमवृत्त, शुक-
विमान तथा श्रीप्रतिष्ठित वर्णित हैं।
२६. शाला-विधान—इसके अन्तर्गत शाला का विस्तार, उसकी लम्बाई,
ऊँचाई, एकशाल गृह के सामान्य लक्षण का वर्णन प्राप्त होता है। तदनन्तर शाला
के भेदों में प्रथम दण्डक, द्वितीय दण्डक, तृतीय दण्डक, चतुर्थ दण्डक, पञ्चम
दण्डक, मौलिक, स्वस्तिक तथा चतुर्मुख आदि वर्णित हैं। पुनः दण्डक आदि के
सामान्य लक्षण वर्णित हैं। द्विशाल भवनों के चतुर्मुख, स्वस्तिक, दण्डवक्त्र भेद;
त्रिशाल भवनों के मेरुकान्त, मौलिभद्र भेद तथा त्रिशाल भवन का प्रमाण प्राप्त होता
है। चतुश्शाल भवनों के प्रमाण एवं भेद तथा उसके दैर्घ्य का प्रमाण वर्णित है। इनके
भेदों में प्रथम सर्वतोभद्र, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा पञ्चम सर्वतोभद्र वर्णित हैं।
इसके पश्चात् विमान आदि के लक्षण तथा वर्धमान के सात भेद वर्णित हैं। नन्द्यावर्त
संज्ञक चतुश्शाल गृह के पाँच भेद, स्वस्तिक भवन, रुचक भवन, चतुश्शाल भवन
की सामान्य विधि, सप्तशालादि, गर्भस्थान, वंशद्वार, विहारशाल, शालापाद-प्रमाण,
आयादि लक्षण तथा खलूरी का निरूपण किया गया है।
२७. चतुर्गृह-विधान—इस अध्याय में चतुश्शाल भवनों का विस्तार से निरूपण
प्राप्त होता है। इसमें प्रथमतः वाटभित्ति ( चारदिवारी ), खलूरिका, भिन्नाभिन्न गृह,
गृहविन्यास, मध्यमण्डल का प्रमाण, मध्यवेदिका, मध्यमण्डप का लक्षण, अन्नागार आदि
स्थान, सुखालय, चतुश्शाल का सामान्य प्रमाण, अन्नालय, धान्यालय, धनालय, गृह
के ऊर्ध्व भाग का वर्णन, वास्तुमण्डप-प्रमाण, गर्भस्थान तथा मुहूर्त-स्तम्भ निरूपित