मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राक्कथन
'मत्तविलास-प्रहसन' सातवीं शताब्दी के पल्लववंशीय राजा
महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा रचित शुद्ध कोटि का प्रहसन है। ऐतिहासिक व्यक्ति
की रचना होने के कारण इस प्रहसन की ओर मेरा ध्यान आकर्षित हुआ।
इस प्रहसन का सरल हिन्दी अनुवाद तथा इसमें आए हुए बौद्ध, जैन व
शैव धर्म से सम्बन्धित शब्दों की टिप्पणियाँ प्रस्तुत करने का यह मेरा एक
प्रयासमात्र है। वस्तुतः, बोधायन के नाम पर प्रचलित किन्तु महेन्द्रविक्रमवर्मा
द्वारा लिखित माने गए 'भगवदज्जुक्रीय-प्रहसन' और 'मत्तविलास-प्रहसन'
के तुलनात्मक अध्ययन' पर, मैं आगे कार्य करने की इच्छुक हूँ।
स्व० प्रो० रामसुरेश त्रिपाठी, भूतपूर्व अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग, अलीगढ़
मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के प्रति मैं कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ जो मेरे
छात्र-जीवन की आधारशिला रहे। उन्हीं की प्रेरणा और प्रोत्साहन के कारण
मैं आज भी अध्ययन-कार्य में प्रवृत्त हूँ। प्रो० चिन्तामणि त्र्यम्बक कँधे के प्रति
भी मैं अत्यधिक कृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे उचित निर्देशन दिया। प्रस्तुत पुस्तक
की प्रस्तावना लिखकर उन्होंने मेरा जो उत्साह बढाया है उसके लिए मैं
उनकी चिर-ऋणी रहूँगी। डा० श्रीरामुल राजेश्वर शर्मा, रीडर, संस्कृत-
विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, के प्रति भी मैं अत्यधिक आभारी हूँ
जिन्होंने इस पुस्तक के रचयिता महेन्द्रविक्रमवर्मा के विषय में समय निर्धारण
सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण जानकारी दी, यत्र तत्र उपस्थित हुई अनेक कठिनाइयों
एवं त्रुटियों को दूर किया और कई रचनात्मक सुझाव भी दिए।
श्रीमती लीलावती त्रिपाठी एवं श्रीमती सुलभा कँधे के प्रति कृतज्ञता
प्रकट करना भी मैं अपना परम-कर्तव्य समझती हूँ जो पुस्तक-लेखन के कार्य
में मेरे लिए सतत् प्रेरणा का स्रोत बनी रहीं। डा० उमेशचन्द्र शर्मा के
प्रति भी मैं आभारी हूँ जिन्होंने पुस्तक की पाण्डुलिपि को पढ़ने का कष्ट
किया तथा कुछ सुझाव दिए। प्रियसखि डा० (श्रीमती) हितेष सिंह ने लेखन
कार्य में जो सहयोग मुझे दिया उसके लिए भी अपनी कृतज्ञता व्यक्त
करती हूँ। अपने पति सैयद ज़ाहिद हसन के प्रति भी मैं आभारी हूँ
जिन्होंने आर्थिक सहायता देकर इस पुस्तक के प्रकाशन में सहयोग दिया।
अन्त में, सहृदय पाठकों से अनुरोध है कि इस पुस्तक की मुद्रण व
अन्य त्रुटियों को लेखिका की प्रथम कृति समझकर क्षमा कर देंगे।
—रानी मजूमदार
संस्कृत विभाग,
महिला महाविद्यालय,
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,
अलीगढ़ (उ० प्र०)
२० सितम्बर, १६८८