मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुभाशीर्वाद
डा० रानी मजूमदार एम० ए० कक्षा में मेरी छात्रा रही हैं।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च प्रथम श्रेणी में एम०ए० उपाधि प्राप्त
करने के बाद उन्होंने सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ-विद्यानगर, गुजरात,
से पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। तदनन्तर वे प्रो० रामसुरेश त्रिपाठी
के साथ 'बृहदारण्यक-उपनिषद्' पर उच्चतर शोधकार्य करती रहीं। साथ ही
वे महिला महाविद्यालय (अ० मु० वि० वि०), अलीगढ़, में अध्यापन-कार्य भी
करती रही हैं। विशेष रूप से संस्कृत-नाट्य का अध्यापन करते हुए छात्रों
में रुचि उत्पन्न करने के लिए पाठ्यक्रम में कुछ हास्यरस-प्रधान प्रहसन भी होने
चाहिएँ, ऐसा उन्हें अनुभव हुआ। इसी प्रेरणा से उन्होंने प्रस्तुत 'मत्तविलास-
प्रहसन' का संस्करण सम्पादित किया है। पूर्व प्रकाशित संस्करणों से इस
संस्करण में बहुत अधिक उपयोगी सामग्री दी गई है। पाठ-शुद्धि का भी विशेष
ध्यान रखा गया है। अनुवाद में प्रत्येक शब्द का उचित अर्थ—एक या अनेक—देने
का प्रयास किया गया है। कापालिक, जैन, बौद्ध सम्प्रदायों के दार्शनिक
सन्दर्भ स्पष्ट करते हुए प्रहसन-काल में इन सम्प्रदायों में जो विकृतियाँ आगईं
थीं उन्हीं को लेकर हास्य रस कैसे पैदा किया गया है, यह भी लेखिका ने
स्पष्टीकरण किया है। विद्वत्तापूर्ण 'भूमिका' तथा टिप्पणियों से इस संस्करण
की उपयोगिता बढ़ गई है। लेखिका इसी प्रकार कार्य करके संस्कृत-विद्या के
क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करें, यही मेरा शुभाशीर्वाद है।
—चिन्तामणि त्र्यम्बक केंधे
प्रोफेसर, संस्कृत विभाग,
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,
अलीगढ़ (उ०प्र०)
२५ सितम्बर, १९८८ ई०