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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 975 of 1098

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Page 975
* अध्याय २५० *९६५

| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्‌ने पूछा— यमराजके समान आप कौन हैं? क्या चाहते हैं? और कहाँसे आ रहे हैं? क्या करनेसे आपकी कामना पूर्ण होगी? ये सभी बातें मुझे बताइये। भगवान् विष्णुकी वह बात सुनकर कालाग्निके समान भयंकर एवं फटी हुई दुन्दुभिके समान बोलनेवाला कालकूट बोला॥ १९-२०॥ |
| को भवानन्तकप्रख्यः किमिच्छसि कुतोऽपि च।<br>किं कृत्वा ते प्रियं जायेदेवमाचक्ष्व मेऽखिलम्॥ १९<br>तच्च तस्य वचः श्रुत्वा विष्णोः कालाग्निसंनिभः।<br>उवाच कालकूटस्तु भिन्नदुन्दुभिनिःस्वनः॥ २० | |
| कालकूट उवाच | कालकूटने कहा— विष्णो! मैं समुद्रसे उत्पन्न हुआ कालकूट नामक विष हूँ। जब परस्पर एक-दूसरेके वधके अभिलाषी देवता तथा दैत्योंद्वारा उग्र वेगसे अद्भुत क्षीरसागर मथा गया, तब मैं उन सभी देवताओं और दानवोंका संहार करनेके लिये उत्पन्न हुआ हूँ। मैं क्षणभरमें ही सभी शरीरधारियोंका संहार कर सकता हूँ। अतः ये सभी लोग या तो मुझे निगल जायें अथवा शंकरकी शरणमें जायें। कालकूटकी वह बात सुनकर देवता और असुर भयभीत हो गये, तब वे ब्रह्मा और विष्णुको आगे करके शंकरजीके पास जानेके लिये प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचनेपर द्वारपाल गणेश्वरोंने जाकर शिवजीसे देवताओं और दैत्योंके आगमनकी सूचना दी। तब शंकरजीसे आज्ञा पाकर वे लोग शिवजीके निकट मन्दराचलकी उस सुवर्णमयी गुफामें गये, जो मुक्तामणयोंसे विभूषित थी, जिसमें स्वच्छ मणिजटित सीढ़ियाँ लगी थीं और जो वैदूर्य मणिके स्तम्भसे शोभायमान थी। वहाँ ब्रह्माजीको आगे कर सभी देवताओं और असुरोंने पृथिवीपर घुटने टेककर शिवजीको (पञ्चाङ्ग) नमस्कार किया और फिर वे इस स्तोत्रका पाठ करने लगे॥ २१-२७॥ |
| अहं हि कालकूटाख्यो विषोऽम्बुधिसमुद्भवः।<br>यदा तीव्रतरारम्भैः परस्परवधैषिभिः॥ २१<br>सुरासुरैर्विमथितो दुग्धाम्भोनिधिरद्भुतः।<br>सम्भूतोऽहं तदा सर्वान् हन्तुं देवान् सदानवान्॥ २२<br>सर्वानिह हनिष्यामि क्षणमात्रेण देहिनः।<br>मां वा ग्रसत वै सर्वे यात वा गिरिशान्तिकम्॥ २३<br>श्रुत्वैतद् वचनं तस्य ततो भीताः सुरासुराः।<br>ब्रह्मविष्णू पुरस्कृत्य गतास्ते शङ्करान्तिकम्॥ २४<br>निवेदितास्ततो द्वाःस्थैस्ते गणैशैः सुरासुराः।<br>अनुज्ञाताः शिवेनाथ विविशुर्गिरिशान्तिकम्॥ २५<br>मन्दरस्य गुहां हैमीं मुक्तामणिविभूषिताम्।<br>सुस्वच्छमणिसोपानां वैदूर्यस्तम्भमण्डिताम्॥ २६<br>तत्र देवासुरैः सर्वैर्जानुभिर्धरणिं गतैः।<br>ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा इदं स्तोत्रमुदाहृतम्॥ २७ | |
| देवदानवा ऊचुः | देवताओं और दानवोंने कहा— विरूपाक्ष! आपको नमस्कार है। दिव्य नेत्रधारी आपको प्रणाम है। आप अपने हाथोंमें पिनाक, वज्र और धनुष धारण करनेवाले हैं, आपको अभिवादन है। हाथमें त्रिशूल और दण्ड धारण करनेवाले जटाधारीको नमस्कार है। आप त्रिलोकीनाथ और प्राणिसमूहके शरीररूप हैं, आपको प्रणाम है। देव-शत्रुओंका संहार करनेवाले तथा चन्द्रमा, अग्नि और सूर्यरूप नेत्र धारण करनेवालेको अभिवादन है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप आपको नमस्कार है। आप ब्रह्मस्वरूप, वेदस्वरूप और देवरूप हैं, आपको प्रणाम है। आप सांख्ययोगस्वरूप और प्राणियोंका कल्याण करनेवाले हैं, आपको अभिवादन है। कामदेवके शरीरके विनाशक और कालके क्षयकर्ता आपको नमस्कार है। आप वेगशाली, देवाधिदेव और वसुरेता हैं, आपको प्रणाम है। सर्वश्रेष्ठ |
| नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्ते दिव्यचक्षुषे।<br>नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय धन्विने॥ २८<br>नमस्त्रिशूलहस्ताय दण्डहस्ताय धूर्जटे।<br>नमस्त्रैलोक्यनाथाय भूतग्रामशरीरिणे॥ २९<br>नमः सुरारिहन्त्रे च सोमाग्न्यर्काग्र्यचक्षुषे।<br>ब्रह्मणे चैव रुद्राय नमस्ते विष्णुरूपिणे॥ ३०<br>ब्रह्मणे वेदरूपाय नमस्ते देवरूपिणे।<br>सांख्ययोगाय भूतानां नमस्ते शम्भवाय ते॥ ३१<br>मन्मथाङ्गविनाशाय नमः कालक्षयंकर।<br>रंहसे देवदेवाय नमस्ते वसुरेतसे॥ ३२ | |