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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 974 of 1098

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Page 974

९६४ * मत्स्यपुराण *


| उपाविशन्नब्धितटे शिरः संगृह्य पाणिना। <br> ततः क्रमेण दुर्वारः सोऽनलः प्रत्यदृश्यत ॥ ७ <br> ज्वालामालाकुलाकारः समन्ताद् भीषणोऽर्चिषा। <br> तेनाग्निना परिक्षिप्ताः प्रायशस्तु सुरासुराः ॥ ८ <br> दग्धाश्चाप्यर्धदग्धाश्च बभ्रमुः सकला दिशः। <br> प्रधाना देवदैत्याश्च भीषितास्तेन वह्निना ॥ ९ <br> अनन्तरं समुद्भूतास्तस्माड्डुण्डुभजातयः। <br> कृष्णसर्पा महादंष्ट्रा रक्ताश्च पवनाशनाः ॥ १० <br> श्वेतपीतास्तथा चान्ये तथा गोनसजातयः। <br> मशका भ्रमरा दंशा मक्षिकाः शलभास्तथा ॥ ११ <br> कर्णशल्याः कृकलासा अनेके चैव बभ्रमुः। <br> प्राणिनो दंष्ट्रिणो रौद्रास्तथा हि विषजातयः ॥ १२ <br> शार्ङ्गहालाहलामुस्तवत्साकागुरुभस्मगाः । <br> नीलपत्रादयश्चान्ये शतशो बहुभेदिनः। <br> येषां गन्धेन दह्यन्ते गिरिशृङ्गाण्यपि द्रुतम्॥ १३ | होकर गिरने लगे और हाथसे सिरको पकड़कर समुद्र-तटपर बैठ गये। तदनन्तर क्रमशः वह दुःसह अग्नि दिखायी पड़ी। उसका आकार ज्वालाओंसे व्याप्त था तथा चारों ओर फैली हुई लपटोंसे वह भीषण लग रही थी। उस अग्निसे प्रायः सभी देवता और दानवगण विक्षिप्त हो उठे और कुछ जले तथा कुछ अधजले हुए सभी दिशाओंमें घूमने लगे। इस प्रकार सभी प्रधान देव तथा दैत्यगण उस अग्निसे भयभीत हो गये। कुछ देरके बाद उस अग्निसे डुण्डुभ जातिके सर्प उत्पन्न हुए। उसी प्रकार काले, विशाल दाढ़ोंवाले, लाल, वायु पीकर रहनेवाले, श्वेत, पीले तथा अन्य गोनस जातिवाले सर्प तथा मशक, भ्रमर, डाँसा, मक्खियाँ, पतंगे, कर्णशल्य, गिरगिट आदि अनेकों जीव उत्पन्न होकर इधर-उधर घूमने लगे। इनके अतिरिक्त अति भीषण दाढ़ोंवाले बहुत-से जीव तथा विषकी अनेकों जातियाँ उत्पन्न हुईं—जैसे शार्ङ्ग, हालाहल, मुस्त, वत्स, अगुरु, भस्म और नील-पत्र आदि। इसी प्रकार अन्य सैकड़ों भेदोपभेदवाले विष उत्पन्न हुए, जिनकी गन्धसे पर्वतोंके शिखर भी तुरंत ही जलने लगे॥ १—१३॥ |
| अनन्तरं नीलरसौघभृङ्ग- <br> भिन्नाञ्जनाभं विषमं श्वसन्तम्। <br> कायेन लोकान्तरपूरकेण <br> केशैश्च वह्निप्रतिमैर्ज्वलद्भिः ॥ १४ <br> सुवर्णमुक्ताफलभूषिताङ्गं <br> किरीटिनं पीतदुकूलजुष्टम्। <br> नीलोत्पलाभं कुसुमैः कृतार्थं <br> गर्जन्तमम्भोधरभीमवेगम् ॥ १५ <br> अद्राक्षुरम्भोनिधिमध्यसंस्थं <br> सविग्रहं देहिभयाश्रयं तम्। <br> विलोक्य तं भीषणमुग्रनेत्रं <br> भूताश्च वित्र्रेसुरथापि सर्वे ॥ १६ <br> केचिद् विलोक्यैव गता ह्यभावं <br> निःसंज्ञतां चाप्यपरे प्रपन्नाः। <br> वेमुर्मुखेभ्योऽपि च फेनमन्ये <br> केचित् त्ववाप्ता विषमामवस्थाम् ॥ १७ <br> श्वासेन तस्य निर्दग्धास्ततो विष्ण्विन्द्रदानवाः। <br> दग्धाङ्गारनिभा जाता ये भूता दिव्यरूपिणः। <br> ततस्तु सम्भ्रमाद् विष्णुस्तमुवाच सुरात्मकम्॥ १८ | तदनन्तर देवताओं और दानवोंने सागरके मध्यमें स्थित एक ऐसा स्वरूप देखा, जिसकी शरीर-कान्ति नीलरस, भ्रमर और घिसे हुए अञ्जनके समान काली थी, जो विषमरूपसे श्वास ले रहा था और शरीरसे लोकान्तरको व्याप्त कर लिया था, जिसके केश जलती हुई अग्निके समान दिखायी पड़ रहे थे, जिसका शरीर सुवर्ण और मोतियोंसे विभूषित था, जो किरीट धारण किये हुए था, जिसके शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था और देहकी कान्ति नीले कमलके समान थी, जो पुष्पोंद्वारा अलंकृत और मेघकी तरह अत्यन्त भयंकर रूपसे गर्जना कर रहा था तथा प्राणियोंके लिये शरीरधारी भयका आश्रयस्थान था। उस भीषण एवं उग्र नेत्रवाले स्वरूपको देखकर सभी प्राणी भयभीत हो उठे। कितने तो देखते ही चल बसे, कितने मूर्च्छित हो गये, कुछ मुखसे फेन उगलने लगे और कुछ लोग विषम अवस्थाको प्राप्त हो गये। उसकी श्वाससे विष्णु, इन्द्र और दानव—सभी जलने लगे। थोड़ी देर पहले जो दिव्य रूपवाले थे, वे जले हुए अंगारके समान हो गये। तब भगवान् विष्णुने भयभीत होकर उस सुरात्मकसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १४—१८॥ |