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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 940 of 1098

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Page 940

९३० * मत्स्यपुराण *

| मेघाः शस्ता घनाः स्निग्धा गजबृंहितनिःस्वनाः।<br>अनुलोमास्तडिच्छस्ताः शक्रचापं तथैव च॥ २४<br>अप्रशस्ते तथा ज्ञेये परिवेषप्रवर्षणे।<br>अनुलोमा ग्रहाः शस्ता वाक्पतिस्तु विशेषतः॥ २५<br>आस्तिक्यं श्रद्दधानत्वं तथा पूज्याभिपूजनम्।<br>शस्तान्येतानि धर्मज्ञ यच्च स्यान्मनसः प्रियम्॥ २६<br>मनसस्तुष्टिरेवात्र परमं जयलक्षणम्।<br>एकतः सर्वलिङ्गानि मनसस्तुष्टिरेकतः॥ २७<br>यानोत्सुकत्वं मनसः प्रहर्षः<br>शुभस्य लाभो विजयप्रवादः।<br>मङ्गल्यलब्धिः श्रवणं च राजन्<br>ज्ञेयानि नित्यं विजयावहानि॥ २८ | हाथियोंकी चिग्घाड़के समान गम्भीर शब्द करनेवाले चिकने घने मेघ शुभदायी होते हैं। पीछेसे चमकनेवाली बिजलीका प्रकाश तथा इन्द्रधनुष प्रशंसनीय हैं। यात्रामें सूर्य एवं चन्द्रमाके मण्डल तथा घनघोर वृष्टिको अशुभ समझना चाहिये। अनुकूल दिशामें उदित हुए ग्रहोंको, विशेषकर बृहस्पतिको शुभसूचक कहा गया है। धर्मज्ञ! (यात्राकालमें) आस्तिकता, श्रद्धा, पूज्योंके प्रति पूज्यभाव और मनकी प्रसन्नता—ये सभी प्रशंसनीय हैं। यात्राकालमें मनका संतोष विजयका परम लक्षण है। तुलनामें एक ओर सभी शुभ शकुन और एक ओर अपने मनकी प्रसन्नताको मानना चाहिये। राजन्! वाहनोंकी उत्सुकता, मनका आनन्दातिरेक, शुभ शकुनोंकी प्राप्ति, विजयसूचक प्रवाद, माङ्गलिक वस्तुओंकी उपलब्धि तथा श्रवण—इन्हें नित्य विजयप्रद जानना चाहिये॥ २४-२८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते मङ्गलाध्यायो नाम त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके यात्रा-प्रसंगमें मङ्गलाध्याय नामक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४३॥


दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय

वामन-प्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें श्रीभगवान्द्वारा अदितिको वरदान

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
राजधर्मस्त्वया सूत कथितो विस्तरेण तु।<br>तथैवाद्भुतमङ्गल्यं स्वप्नदर्शनमेव च॥ १<br>विष्णोरिदानीं माहात्म्यं पुनर्वक्तुमिहार्हसि।<br>कथं स वामनो भूत्वा बबन्ध बलिदानवम्।<br>क्रमतः कीदृशं रूपमासील्लोकत्रये हरेः॥ २सूतजी! आपने विस्तारपूर्वक राजधर्मका वर्णन तो कर दिया, उसी प्रकार अद्भुत शकुन एवं स्वप्नदर्शनका भी निरूपण कर दिया। अब आप पुनः भगवान् विष्णुके माहात्म्यका वर्णन कीजिये। किस प्रकार भगवान्ने वामनस्वरूप धारणकर दानवराज बलिको बाँधा था और नापते समय किस प्रकार भगवान्का वह शरीर बढ़कर तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गया था?॥ १-२॥
सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
एतदेव पुरा पृष्टः कुरुक्षेत्रे तपोधनः।<br>शौनकस्तीर्थयात्रायां वामनायतने पुरा॥ ३<br>यदा समयभेदित्वं द्रौपद्याः पार्थिवं प्रति।<br>अर्जुनेन कृतं तत्र तीर्थयात्रां तदा ययौ॥ ४<br>धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे वामनायतने स्थितः।<br>दृष्ट्वा स वामनं तत्र अर्जुनो वाक्यमब्रवीत्॥ ५मुनिगण! इसी वृत्तान्तको प्राचीनकालमें तीर्थ-यात्राके समय कुरुक्षेत्रके वामनायतनमें अर्जुनने तपस्वी शौनकजीसे पूछा था। जिस समय उन्होंने द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए युधिष्ठिरके नियमोंका उल्लङ्घन किया था, उस समय वे उस पापकी शान्तिके लिये तीर्थयात्रामें गये हुए थे। उस समय धर्ममय कुरुक्षेत्रके वामनायतनमें पहुँचकर वामनभगवान्का दर्शन कर अर्जुनने इस प्रकार प्रश्न किया था॥ ३-५॥