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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 939 of 1098

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Page 939

* अध्याय २४३ * | ९२९

| एवमादीनि चान्यानि अशस्तान्यभिदर्शने।<br>अशस्तो वाद्यशब्दश्च भिन्नभैरवजर्जरः ॥ ८<br>पुरतः शब्द एहीति शस्यते न तु पृष्ठतः।<br>गच्छेति पश्चाद् धर्मज्ञ पुरस्तात् तु विगर्हितः ॥ ९<br>क्व यासि तिष्ठ मा गच्छ किं ते तत्र गतस्य तु।<br>अन्ये शब्दाश्च येऽनिष्टास्ते विपत्तिकरा अपि ॥ १०<br>ध्वजादिषु तथा स्थानं क्रव्यादानां विगर्हितम्।<br>स्खलनं वाहनानां च वस्त्रसङ्गस्तथैव च ॥ ११<br>निर्गतस्य तु द्वारादौ शिरसश्चाभिघातिता।<br>छत्रध्वजानां वस्त्राणां पतनं च तथाशुभम् ॥ १२<br>दृष्टे निमित्ते प्रथमममङ्गल्यविनाशनम्।<br>केशवं पूजयेद् विद्वान् स्तवेन मधुसूदनम् ॥ १३<br>द्वितीये तु ततो दृष्टे प्रतीपे प्रविशेद् गृहम्।<br>अथेष्टानि प्रवक्ष्यामि मङ्गल्यानि तथानघ ॥ १४<br>श्वेताः सुमनसः श्रेष्ठाः पूर्णकुम्भास्तथैव च।<br>जलजाः पक्षिणश्चैव मांसमत्स्याश्च पार्थिव ॥ १५<br>गावस्तुरंगमा नागा बद्ध एकः पशुस्त्वजः।<br>त्रिदशाः सुहृदो विप्रा ज्वलितश्च हुताशनः ॥ १६<br>गणिका च महाभाग दूर्वा चार्द्रं च गोमयम्।<br>रुक्मं रूप्यं तथा ताम्रं सर्वरत्नानि चाप्यथ ॥ १७<br>औषधानि च धर्मज्ञ यवाः सिद्धार्थकास्तथा।<br>नृवाह्यमानं यानं च भद्रपीठं तथैव च ॥ १८<br>खड्गं छत्रं पताका च मृदश्चायुधमेव च।<br>राजलिङ्गानि सर्वाणि शवं रुदितवर्जितम् ॥ १९<br>घृतं दधि पयश्चैव फलानि विविधानि च।<br>स्वस्तिकं वर्धमानं च नन्द्यावर्तं सकौस्तुभम् ॥ २०<br>वादित्राणां सुखः शब्दो गम्भीरः सुमनोहरः।<br>गान्धारषड्जऋषभा ये च शास्तास्तथा स्वराः ॥ २१<br>वायुः सशर्करो रूक्षः सर्वत्र समुपस्थितः।<br>प्रतिलोमस्तथा नीचो विज्ञेयो भयकृद् द्विज ॥ २२<br>अनुकूलो मृदुः स्निग्धः सुखस्पर्शः सुखावहः।<br>रूक्षा रूक्षस्वरा भद्राः क्रव्यादाः परिगच्छताम् ॥ २३ | ये तथा इनके अतिरिक्त और भी वस्तुएँ देखनेमें अशुभ मानी गयी हैं। वाद्योंके भयानक तथा बिना तालके रूखे स्वर भी अशुभ कहे गये हैं। धर्मज्ञ! सामनेसे 'आओ'—ऐसा शब्द कहना शुभ है, किंतु पीछेसे नहीं। इसी तरह पीछेसे 'जाओ' यह कहना शुभ है, किंतु वही आगेसे कहना अशुभ है। 'कहाँ जा रहे हो, रुको, मत जाओ; तुम्हारे वहाँ जानेसे क्या लाभ?'—इस प्रकारके जो दूसरे अनिष्ट शब्द हैं, वे सभी विपत्तिकारक हैं। ध्वजा, पताका आदिपर मांसभक्षी पक्षियोंका बैठना, वाहनोंका फिसलना तथा वस्त्रका अटक जाना निन्दित माना गया है। द्वारसे निकलते समय सिरमें चोट लगना तथा छत्र, ध्वजा और वस्त्रादिका गिरना अशुभकारक है। प्रथम बार अपशकुन दीखनेपर विद्वान् राजाको चाहिये कि वह अशुभविनाशक एवं मधुहन्ता भगवान् केशवकी स्तोत्रोंद्वारा पूजा¹ करे। दूसरी बार पुनः अपशकुन दिखायी पड़नेपर उसे घरमें लौट जाना चाहिये ॥ २—१३ १/२ ॥<br><br>अनघ! अब मैं शुभ-सूचक अभीष्ट शकुनोंका वर्णन कर रहा हूँ। राजन्! श्वेत फूल, भरा हुआ घट, जलजन्तु, पक्षी, मांस, मछलियाँ, गौएँ, घोड़े, हाथी, अकेला बँधा हुआ पशु, बकरा, देवता, मित्र, ब्राह्मण, जलती हुई अग्नि, वेश्या, दूर्वा, गीला गोबर, सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, सभी प्रकारके रत्न, ओषधियाँ, जौ, पीली सरसों, मनुष्योंको ढोता हुआ वाहन, सुन्दर सिंहासन, तलवार, छत्र, पताका, मिट्टी, हथियार, सभी प्रकारके राजचिह्न, रुदनरहित मुर्दा, घी, दही, दूध, विविध प्रकारके फल, स्वस्तिक², वर्धमान³, नन्द्यावर्त⁴, कौस्तुभमणि, वाद्योंके सुखदायक, मनोहर एवं गम्भीर शब्द, गान्धार, षड्ज तथा ऋषभ आदि स्वर शुभदायक माने गये हैं। द्विज! यदि बालूके कणोंसे युक्त रूखी वायु सर्वत्र प्रतिकूल दिशामें पृथ्वीका स्पर्श करके बह रही हो तो उसे भयकारी जानना चाहिये। अनुकूल दिशामें बहनेवाली मृदु, शीतल एवं सुखस्पर्शी वायु सुखदायिनी होती है। निष्ठुर एवं रूखे स्वरमें बोलनेवाले मांसभक्षी जीव यात्रियोंके लिये कल्याणकारक होते हैं। |


१. ऐसे स्तोत्रोंमें विष्णुसहस्रनाम, गजेन्द्रमोक्ष, (महापुरुषविद्या) 'जितं ते पुण्डरीकाक्ष' आदि श्रेष्ठ हैं।
२. ऐसा प्रासाद जिसमें पूर्वकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३४)
३. वह प्रासाद जिसमें दक्षिणकी ओर दरवाजा न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३३)
४. एक प्रकारका मकान, जिसमें पश्चिमकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३२)