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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 932 of 1098

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Page 932

९२२ * मत्स्यपुराण *


सर्वस्वं वा ददेत् तत्र राजसूयफलं लभेत्।<br>एवं कृत्वा विधानेन विप्रांस्तांश्च विसर्जयेत्॥ ३७<br><br>प्रीयतां पुण्डरीकाक्षः सर्वयज्ञेश्वरो हरिः।<br>तस्मिंस्तुष्टे जगत् तुष्टं प्रीणिते प्रीणितं भवेत्॥ ३८<br><br>एवं सर्वोपघाते तु देवमानुषकारिते।<br>इयं शान्तिस्तवाख्याता यां कृत्वा सुकृती भवेत्॥ ३९<br><br>न शोचेज्जन्ममरणे कृताकृतविचारणे।<br>सर्वतीर्थेषु यत् स्नानं सर्वयज्ञेषु यत्फलम्।<br>तत्फलं समवाप्नोति कृत्वा यज्ञत्रयं नृप॥ ४०अथवा सर्वस्व दान कर दे। ऐसा करनेसे उसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ करके उन ब्राह्मणोंको विदा करे और कहे—‘सभी यज्ञोंके स्वामी कमलनेत्र भगवान् विष्णु प्रसन्न हों; क्योंकि उनके संतुष्ट होनेपर समस्त जगत् संतुष्ट और प्रसन्न होनेपर प्रसन्न होता है।’ इस प्रकार देवताओं तथा मनुष्योंद्वारा की गयी सभी बाधाओंके लिये यह शान्ति कही गयी है, जिसे मैंने तुम्हें बताया है और जिसका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य पुण्यवान् होता है और उसे जन्म-मृत्यु तथा उचित-अनुचितके विचारके समय चिन्ता नहीं करनी पड़ती। राजन्! सभी तीर्थोंमें स्नान करने और सभी यज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल इन तीनों यज्ञोंको करनेवाला मनुष्य प्राप्त कर लेता है॥ ३१—४०॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ग्रहयज्ञविधानं नामैकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ग्रहयज्ञविधान नामक दो सौ उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३९॥


दो सौ चालीसवाँ अध्याय

राजाओंकी विजयर्थ यात्राका विधान

मनुरुवाच<br>इदानीं सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।<br>यात्राकालविधानं मे कथयस्व महीक्षिताम्॥ १<br><br>मत्स्य उवाच<br>यदा मन्येत नृपतिराक्रन्देन बलीयसा।<br>पार्ष्णिग्राहाभिभूतोऽरिस्तदा यात्रां प्रयोजयेत्॥ २<br><br>योधान् मत्वा प्रभूतांश्च प्रभूतं च बलं मम।<br>मूलरक्षासमर्थोऽस्मि तदा यात्रां प्रयोजयेत्॥ ३<br><br>अशुद्धपार्ष्णिर्नृपतिर्न तु यात्रां प्रयोजयेत्।<br>पार्ष्णिग्राहाधिकं सैन्यं मूले निक्षिप्य च व्रजेत्॥ ४<br><br>चैत्र्यां वा मार्गशीर्ष्यां वा यात्रां यायान्नराधिपः।<br>चैत्र्यां पश्येच्च नैदाघं हन्ति पुष्टिं च शारदीम्॥ ५<br><br>एतदेव विपर्यस्तं मार्गशीर्ष्यां नराधिपः।<br>शत्रोर्वा व्यसने यायात् काल एव सुदुर्लभः॥ ६मनुजीने कहा— सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता एवं सर्वशास्त्रविशारद भगवन्! अब आप मुझसे राजाओंके यात्राकालिक विधानका वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>मत्स्यभगवान्ने कहा— जिस समय राजा अपनेको किसी भयंकर युद्धसे घिरा हुआ तथा सीमावर्ती शत्रुको पराजित समझ ले, उस समय उसे यात्रा कर देनी चाहिये। साथ ही जब वह यह समझ ले कि हमारे पास बहुसंख्यक योद्धा हैं, हमारी सेना बहुत बड़ी है और मैं अपने दुर्गकी रक्षा करनेमें समर्थ हूँ, उस समय उसके लिये यात्रा करना उचित है। सीमावर्ती राजाके शत्रु बन जानेपर राजाको यात्रा नहीं करनी चाहिये। उस समय वह पार्श्ववर्ती राजासे अधिक सेना प्राप्त कर यात्रा कर सकता है। राजाको चैत्र या मार्गशीर्षकी पूर्णिमाको दिवि-जयार्थ यात्रा करनी चाहिये। चैत्र-पूर्णिमाको यात्रा करनेवाला ग्रीष्म-ऋतुका दर्शन करेगा तथा शरत्कालीन शीत-भयसे रहित रहेगा। ठीक इसी प्रकारका परिवर्तन मार्गशीर्ष-पूर्णिमाको यात्रा करनेसे होता है। अथवा शत्रुके आपत्तिमें फँसनेपर यात्रा करे, पर ऐसा समय अत्यन्त दुर्लभ है।