मत्स्य महापुराण

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* अध्याय २३१ * | ९२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यजमानः पयोभक्षी फलाशी च तथानघ ॥ २१<br>यवादिव्रीहयो माषास्तिलाश्च सह सर्षपैः।<br>पालाशाः समिधः शस्ता वसोर्धारा तथोपरि ॥ २२<br>मासेऽथ प्रथमे दद्याद् ऋग्भ्यः क्षीरभोजनम्।<br>द्वितीये कृसरां दद्याद् धर्मकामार्थसाधनीम् ॥ २३<br>तृतीये मासि संयावो देयो वै रविनन्दन।<br>चतुर्थे मोदका देया विप्राणां प्रीतिमावहन् ॥ २४<br>पञ्चमे दधिभक्तं तु षष्ठे वै सक्तुभोजनम्।<br>पूपाश्च सप्तमे देया ह्यष्टमे घृतपूपकाः ॥ २५<br>षष्ट्योदनं च नवमे दशमे यवषष्टिका।<br>एकादशे समाषं तु भोजनं रविनन्दन ॥ २६<br>द्वादशे त्वथ सम्प्राप्ते मासे रविकुलोद्बह।<br>षड्रसैः सह भक्ष्यैश्च भोजनं सार्वकामिकम् ॥ २७<br>देया द्विजानां राजेन्द्र मासि मासि च दक्षिणाः।<br>अहतवासः संवीतो दिनार्धं होमयेच्छुचिः ॥ २८<br>तस्मात् सदोत्थितैर्भाव्यं यजमानैः सह द्विजैः।<br>इन्द्राद्यादिसुराणां च प्रीणनं सार्वकामिकम् ॥ २९<br>कृत्वा सुराणां राजेन्द्र पशुघातसमन्वितम्।<br>सर्वदानानि देवाना मग्निष्टोमं च कारयेत् ॥ ३० | अनघ ! (अनुष्ठानके समय) यजमानको दुग्ध अथवा फलका आहार करना चाहिये। जौ आदि अन्न, उड़द, तिल, सरसों और पलाशकी लकड़ी इस होममें प्रशंसित हैं। इसके ऊपर वसुधारा छोड़नी चाहिये। पहले महीनेमें ऋत्विजोंको दुग्धका भोजन देना चाहिये। दूसरे महीनेमें धर्म, अर्थ और कामकी साधिका खिचड़ी खिलानी चाहिये। रविनन्दन ! तीसरे महीनेमें गोझिया देनी चाहिये। चौथे महीनेमें ब्राह्मणोंको प्रसन्न करते हुए लड्डू दे। पाँचवें महीनेमें दही और भात, छठे महीनेमें सत्तूका भोजन, सातवें महीनेमें मालपुआ और आठवें मासमें मालपुआ और घी दे। रविनन्दन ! नवें महीनेमें साठीका भात, दसवेंमें जौ-मिश्रित साठीका भात तथा ग्यारहवें महीनेमें उड़दयुक्त भोजन देना चाहिये। सूर्यकुलोत्पन्न ! बारहवें महीनेके आनेपर छहों रसोंसे युक्त सभी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला भोजन दे। राजेन्द्र ! उन ब्राह्मणोंको प्रतिमास दक्षिणा भी देनी चाहिये। मध्याह्नके समय पवित्र वस्त्र धारण कर हवन करनेका विधान है। इसलिये यजमानको ब्राह्मणोंके साथ सर्वदा यज्ञ करनेके लिये उत्साहमयुक्त रहना चाहिये। इन्द्र आदि देवताओंको प्रसन्न करना चाहिये, यह सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। राजेन्द्र ! फिर देवताओंके उद्देश्यसे बलि देकर सभी प्रकारके दानकर्मोंको सम्पादित करे। साथ ही अग्निष्टोमका अनुष्ठान करे॥ २१—३०॥ |
| एवं कृत्वा विधानेन पूर्णाहुतिः शते शते।<br>सहस्रे द्विगुणा देया यावच्छतसहस्रकम् ॥ ३१<br>पुरोडाशस्ततः साध्यो देवतार्थे च ऋत्विजैः।<br>युक्तो वसन् मानवैश्च पुनः प्राप्तार्चनान् द्विजान् ॥ ३२<br>प्रीणयित्वा सुरान् सर्वान् पितॄनेव ततः क्रमात्।<br>कृत्वा शास्त्रविधानेन पिण्डानां च समर्पणम् ॥ ३३<br>समाप्तौ तस्य होमस्य विप्राणामथ दक्षिणाम्।<br>समां चैव तुलां कृत्वा बध्वा शिक्यद्वयं पुनः ॥ ३४<br>आत्मानं तोलयेत् तत्र पत्नीं चैव द्वितीयाकाम्।<br>सुवर्णेन तथाऽऽत्मानं रजतेन तथा प्रियाम् ॥ ३५<br>तोलयित्वा ददेत् राजा वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>ददेच्छतसहस्रं तु रूप्यस्य कनकस्य च ॥ ३६ | इस प्रकार विधिपूर्वक ग्रहयाग सम्पन्न कर शत होममें सौ, हजार होममें हजारसे लेकर लक्ष होमतक दो सौ पूर्णाहुतियाँ देनी चाहिये। तत्पश्चात् ऋत्विजोंको देवताओंके लिये पुरोडाश देना चाहिये। उन्हें क्रमशः उन्हीं आगत मनुष्योंमें ही उपस्थित समझना चाहिये। फिर क्रमशः पूजित ब्राह्मणों और देवताओंको प्रसन्न करके सभी पितरोंको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पिण्ड समर्पित करे। इस होमके समाप्त होनेपर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। तदुपरान्त राजाको चाहिये कि कृपणताको छोड़कर समान भागवाली तराजू बनवाकर उसमें दो पलड़े बाँध दे और उसपर पत्नीसहित अपनेको तौले। उस समय अपनेको सुवर्णसे तथा पत्नीको चाँदीसे तौलनेका विधान है। तौलनेके बाद उसे ब्राह्मणको दे देना चाहिये। पुनः चाँदी तथा सुवर्णकी बनी हुई एक लक्ष मुद्राका दान करे |