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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 851 of 1098

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Page 851
* अध्याय २०७ *८४१

| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— पृथ्वीपते! छाती, पीठ, सिर, दोनों कोख तथा कमर— इन छः उन्नत स्थानोंवाली धेनुओंको विज्ञलोग श्रेष्ठ मानते हैं। सूर्यपुत! दोनों कान, दोनों नेत्र तथा ललाट—इन पाँच स्थानोंका सम-आयत होना प्रशंसित है। पूँछ, गलकम्बल, दोनों सक्थियाँ (घुटनोंसे नीचेके भाग) और चारों स्तन—ये आठ तथा सिर और गर्दन—ये दो मिलाकर दस स्थान आयत होनेपर श्रेष्ठ माने गये हैं। भूपते! ऐसी सर्वलक्षणसम्पन्न धेनुके शुभ लक्षणोंसे युक्त बछड़ेकी भी परीक्षा करनी चाहिये। जिसका कंधा और ककुद् ऊँचा हो, पूँछ और गलेका कम्बल (चमड़ा) कोमल हो, कटितट और स्कन्ध विशाल हो, वैदूर्य मणिके समान नेत्र हों, सींगोंका अग्रभाग प्रबाल (मूँगे)-के सदृश हो, पूँछ लम्बी तथा मोटी हो, तीखे अग्रभागवाले नौ या अठारह सुन्दर दाँत हों तथा मल्लिका-पुष्पोंकी तरह श्वेत आँखें हों, ऐसे वृषका उत्सर्ग करना चाहिये, उसके गृहमें रहनेसे भी धन-धान्यकी वृद्धि होती है॥ १०—१५॥ |
| उरः पृष्ठं शिरः कुक्षी श्रोणी च वसुधाधिप।<br>षडुन्नतानि धेनूनां पूजयन्ति विचक्षणाः॥ १०<br>कर्णौ नेत्रे ललाटं च पञ्च भास्करनन्दन।<br>समायतानि शस्यन्ते पुच्छं सास्ना च सक्थिनी॥ ११<br>चत्वारश्च स्तना राजन् ज्ञेया ह्यष्टौ मनीषिभिः।<br>शिरो ग्रीवायताश्चैते भूमिपाल दश स्मृताः॥ १२<br>तस्याः सुतं परीक्षेत वृषभं लक्षणान्वितम्।<br>उन्नतस्कन्ध ककुद्मृजुलाङ्गूलकम्बलम्॥ १३<br>महाकटितटस्कन्धं वैदूर्यमणिलोचनम्।<br>प्रवालगर्भशृङ्गाग्रं सुदीर्घपृथुवालधिम्॥ १४<br>नवाष्टादशसंख्यैर्वा तीक्ष्णाग्रैर्दशनैः शुभैः।<br>मल्लिकाक्षञ्च मोक्तव्यो गृहेऽपि धनधान्यदः॥ १५ | |
| वर्णतस्ताम्रकपिलो ब्राह्मणस्य प्रशस्यते।<br>श्वेतो रक्तश्च कृष्णश्च गौरः पाटल एव च॥ १६<br>मद्रिकस्ताम्रपृष्ठश्च शबलः पञ्चवालकैः।<br>पृथुकर्णो महास्कन्धः श्लक्ष्णरोमा च यो भवेत्।<br>रक्ताक्षः कपिलो यश्च रक्तशृङ्गतलो भवेत्॥ १७<br>श्वेतोदरः कृष्णपार्श्वो ब्राह्मणस्य तु शस्यते।<br>स्निग्धो रक्तेन वर्णेन क्षत्रियस्य प्रशस्यते॥ १८<br>काञ्चनाभेन वैश्यस्य कृष्णोनाप्यन्त्यजन्मनः।<br>यस्य प्रागायते शृङ्गे भ्रूमुखाभिमुखे सदा॥ १९<br>सर्वेषामेव वर्णानां सर्वः सर्वार्थसाधकः।<br>मार्जारपादः कपिलो धन्यः कपिलपिङ्गलः॥ २०<br>श्वेतो मार्जारपादस्तु धन्यो मणिनिभेक्षणः।<br>करटः पिङ्गलश्चैव श्वेतपादस्तथैव च॥ २१<br>सर्वपादसितो यश्च द्विपादश्वेत एव च।<br>कपिञ्जलनिभो धन्यस्तथा तित्तिरिसंनिभः॥ २२ | ब्राह्मणके लिये ताम्रके समान लाल अथवा कपिल वर्णका वृषभ उत्तम है। जो सफेद, लाल, काला, भूरा, पाटल, पूरा ऊँचा लाल पीठवाला, पाँच प्रकारके रोएँसे चितकबरा, स्थूल कानोंवाला विशाल कंधेसे युक्त, चिकने रोमोंवाला, लाल आँखोंवाला, कपिल, सींगका निचला भाग लाल रंगवाला, सफेद पेट और कृष्ण पार्श्वभागवाला हो, ऐसा वृषभ ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ कहा गया है। लाल रंगके चिकने रोमवाला वृषभ क्षत्रिय जातिके लिये, सुवर्णके समान वर्णवाला वृषभ वैश्यके लिये और काले रंगका वृष शूद्रके लिये उत्तम माना गया है। जिस वृषभके सींग आगेकी ओर विस्तृत तथा भौंहें मुखकी ओर झुकी हों, वह सभी वर्णोंके लिये सर्वार्थ-सिद्ध करनेवाला होता है। बिलावके समान पैरोंवाला, कपिल या पीले रंगका मिश्रित वृषभ धन्य होता है। श्वेत रंगका, बिल्लीके समान पैरवाला और मणिके समान आँखोंवाला वृषभ धन्य है। कौवेके समान काले और पीले रंगवाला तथा श्वेत पैरोंवाला वृष धन्य है। जिसके सभी पैर अथवा दो पैर श्वेतवर्णके हों और जिसका रंग कपिञ्जल अथवा तीतरके समान हो, वह भी धन्य है॥ १६—२२॥ |
| आकर्णमूलं श्वेतं तु मुखं यस्य प्रकाशते।<br>नन्दीमुखः स विज्ञेयो रक्तवर्णो विशेषतः॥ २३ | जिस वृषभका मुख कानतक श्वेत दिखायी पड़ता हो तथा विशेषतया वह लाल वर्णका हो, उसे नन्दीमुख जानना चाहिये। |