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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 850 of 1098

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Page 850

८४० * मत्स्यपुराण *


| धनदेशपरित्यागं न चैवेहाप्नुयात् क्वचित्।<br>कृष्णोप्सितं कृष्णमृगस्य चर्म<br>दत्त्वा द्विजेन्द्राय समाहितात्मा।<br>यथोक्तमेतन्मरणं न शोचेत्<br>प्राप्नोत्यभीष्टं मनसः फलं तत्॥ ४१ | उसे मर्त्यलोकमें कहीं भी धन और देशके परित्यागका अवसर नहीं प्राप्त होता। जो मनुष्य समाहितचित्त हो कुलीन ब्राह्मणको श्रीकृष्णकी प्रिय वस्तु कृष्ण-मृगचर्मका दान करता है वह कभी मृत्युकी चिन्तासे शोकग्रस्त नहीं होता और अपने मनके अनुकूल सभी फलोंको प्राप्त कर लेता है॥ ३८—४१॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कृष्णाजिनप्रदानं नाम षडधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कृष्णमृगचर्मप्रदान नामक दो सौ छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०६॥


दो सौ सातवाँ अध्याय

उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व

मनुरुवाच<br>भगवन् श्रोतुमिच्छामि वृषभस्य च लक्षणम्।<br>वृषोत्सर्गविधिं चैव तथा पुण्यफलं महत्॥ १मनुजीने कहा—भगवन्! अब मैं उत्सर्ग किये जानेवाले वृषभके लक्षणों, वृषोत्सर्गकी विधि और वृषोत्सर्गसे प्राप्त होनेवाले महान् पुण्यफलको सुनना चाहता हूँ॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>धेनुमादौ परीक्षेत सुशीलां च गुणान्विताम्।<br>अव्यङ्गामपरिक्लिष्टां जीववत्सामरोगिणीम्॥ २<br>स्निग्धवर्णां स्निग्धखुरां स्निग्धशृङ्गीं तथैव च।<br>मनोहराकृतिं सौम्यां सुप्रमाणामनुद्धताम्॥ ३<br>आवर्तैर्दक्षिणावर्तैर्युक्तां दक्षिणतस्तथा।<br>वामावर्तैर्वामतश्च विस्तीर्णजघनां तथा॥ ४<br>मृदुसंहतताम्रोष्ठीं रक्तग्रीवासुशोभिताम्।<br>अश्यामदीर्घा स्फुटिता रक्तजिह्वा तथा च या॥ ५<br>विस्रावामलनेत्रा च शफैर्विरलैरदृढैः।<br>वैदूर्यमधुवर्णैश्च जलबुद्बुदसंनिभैः॥ ६<br>रक्तस्निग्धैश्च नयनैस्तथा रक्तकनीनिकैः।<br>सप्तचतुर्दशदन्ता तथा वा श्यामतालुका॥ ७<br>षडुन्नता सुपाश्र्वोरुः पृथुपञ्चसमायता।<br>अष्टायतशिरोग्रीवा या राजन् सा सुलक्षणा॥ ८मत्स्यभगवान् बोले—राजन्! सर्वप्रथम धेनुकी परीक्षा करनी चाहिये। जो सुशीला, गुणवती, अविकृत अङ्गोवाली, मोटी-ताजी, जिसके बछड़े जीते हों, रोगरहित, मनोहर रंगवाली, चिकने खुरवाली, चिकने सींगोंवाली, सुदृश्य, सीधी-सादी, न अधिक ऊँची, न अधिक नाटी अर्थात् मध्यम कदवाली, अचञ्चल, भँवरीवाली, विशेषतः दाहिनी ओरकी भँवरियाँ दाहिनी ओर और बायीं ओरकी बायीं ओर हों, विस्तृत जाँघोंवाली, मुलायम एवं सटे हुए लाल होठोंवाली, लाल गलेसे सुशोभित, काली एवं लम्बी न हो ऐसी स्फुटित लाल जिह्वावाली, अश्रुसहित निर्मल नेत्रोंवाली, सुदृढ़ एवं सटे हुए खुरोंवाली, वैदूर्य, मधु अथवा जलके बुद्बुदके समान रंगोंवाली, लाल चिकने नेत्र और लाल कनीनिकासे युक्त, इक्कीस दाँत और श्यामवर्णके तालुसे सम्पन्न हो, जिसके छः स्थान उच्च, पाँच स्थान समान, सिर, ग्रीवा और आठ स्थान विस्तृत तथा बगल और ऊरु देश सुन्दर हों, वह गौ शुभ लक्षणोंसे युक्त मानी गयी है॥ २—८॥
मनुरुवाच<br>षडुन्नताः के भगवन् के च पञ्च समायताः।<br>आयताश्च तथैवाष्टौ धेनूनां के शुभावहाः॥ ९मनुने पूछा—भगवन्! आपने जो यह बतलाया कि गौओंके छः स्थान उन्नत, पाँच स्थान सम तथा आठ स्थान आयत होने चाहिये, वे शुभदायक स्थान कौन-कौन हैं?॥ ९॥