Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 708 of 1098

Read in context
Page 708

६९८ * मत्स्यपुराण *


तं योगवन्तं विज्ञाय सम्पूर्णैश्वर्यमुत्तमम्।<br>पदे ब्रह्माणि विश्वेशं न्ययोजयत योगवित्॥ १३<br><br>ततस्तस्मिन् महातोये महीशो हरिरच्युतः।<br>स्वयं क्रीडंश्च विधिवन्मोदते सर्वलोककृत्॥ १४<br><br>पद्मं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्तदा।<br>सहस्रपर्णं विरजं भास्कराभं हिरण्मयम्॥ १५<br><br>हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलप्रभ-<br>मुपस्थितं शरदमलार्कतेजसम्।<br>विराजते कमलमुदारवर्चसं<br>ममात्मनस्तनुरुहचारुदर्शनम् ॥ १६ ॥हैं, उसे योगसम्पन्न सम्पूर्ण उत्तम ऐश्वर्योंसे युक्त और विश्वके शासनकी क्षमतासे पूर्ण जानकर ब्रह्माके पदपर नियुक्त कर देते हैं। तत्पश्चात् जो सम्पूर्ण लोकोंके रचयिता, पृथ्वीके स्वामी और अपनी महिमासे कभी भी च्युत होनेवाले नहीं हैं, वे श्रीहरि उस महार्णवके जलमें स्वयं विधिपूर्वक क्रीडा करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। उस समय वे अपनी नाभिसे एक कमल उत्पन्न करते हैं। उस स्वर्णमय कमलमें एक हजार पत्ते होते हैं। वह परागरहित और सूर्यके समान कान्तिमान् होता है। उस समय अग्निकी जलती हुई शिखाओंकी उज्ज्वल कान्तिके समान देदीप्यमान, शरत्कालीन निर्मल सूर्यके सदृश तेजस्वी, भगवान्‌की रोमावलि-सरीखे परम दर्शनीय तथा उत्तम कान्तिमान् उस प्रकट हुए कमलकी विशेष शोभा होती है॥११—१६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे पद्मोद्भवो नामाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥१६८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसंगमें पद्मोद्भव नामक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१६८॥


एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय

नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव तथा उस कमलका साङ्गोपाङ्ग वर्णन

मत्स्य उवाच<br>अथ योगवतां श्रेष्ठमसृजद् भूरितेजसम्।<br>स्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम्॥ १<br>यस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृते।<br>सर्वतेजोगुणमयं पार्थिवैर्लक्षणैर्वृतम्॥ २<br>तच्च पद्मं पुराणज्ञाः पृथिवीरूपमुत्तमम्।<br>नारायणसमुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥ ३<br>या पद्मा सा रसा देवी पृथिवी परिचक्ष्यते।<br>ये पद्मसारगुरवस्तान् दिव्यान् पर्वतान् विदुः॥ ४<br>हिमवन्तं च मेरुं च नीलं निषधमेव च।<br>कैलासं मुञ्जवन्तं च तथान्यं गन्धमादनम्॥ ५<br>पुण्यं त्रिशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेव च।<br>उदयं पिञ्जरं चैव विन्ध्यवन्तं च पर्वतम्॥ ६<br>एते देवगणानां च सिद्धानां च महात्मनाम्।<br>आश्रयाः पुण्यशीलानां सर्वकामफलप्रदाः॥ ७मत्स्यभगवान्ने कहा—राजर्षे ! तदनन्तर नारायणने अनेकों योजन विस्तारवाले उस स्वर्णमय कमलमें सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करनेवाले ब्रह्माको उत्पन्न किया। वे योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परम तेजस्वी, सब ओर मुखवाले, सभी तेजोमय गुणोंसे युक्त और राजलक्षणोंसे सुशोभित थे। पुराणोंके ज्ञाता महर्षिगण उस कमलको नारायणसे उत्पन्न हुआ उत्तम पृथ्वीरूप बतलाते हैं। जो पद्मा है, वही रसा नामसे विख्यात पृथ्वीदेवी कही जाती है और जो कमलके सार-तत्त्वसे युक्त होनेके कारण भारी अंश हैं, उन्हें दिव्य पर्वत कहा जाता है। इस प्रकार जो हिमवान्, मेरु, नील, निषध, कैलास, मुञ्जवान् तथा दूसरा गन्धमादन, पुण्यमय त्रिशिखर, रमणीय मन्दर, उदयाचल, पिञ्जर तथा विन्ध्यवान् पर्वत हैं—ये सभी देवगणों, सिद्धों और पुण्यशील महात्माओंके निवासस्थान तथा समस्त कामनाओंका फल प्रदान करनेवाले हैं।