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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 707 of 1098

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Page 707

* अध्याय १६८ * ६९७


एक सौ अड़सठवाँ अध्याय

पञ्चमहाभूतोंका प्राकट्य तथा नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
आपवः स विभुर्भूत्वा चारयामास वै तपः।<br>छादयित्वाऽऽत्मनो देहं यादसां कुलसम्भवम्॥ १राजन्! तदनन्तर वे सर्वव्यापी नारायण जल-जन्तुओंके कुलमें उत्पन्न अपने शरीरको छिपाकर जलमें निवास करते हुए तपस्यामें संलग्न हो गये। कुछ समयके पश्चात् उन महाबली
ततो महात्मातिबलो मतिं लोकस्य सर्जने।<br>महतां पञ्चभूतानां विश्वो विश्वमचिन्तयत्॥ २महात्माने जगत्की सृष्टि करनेका विचार किया। तब उन विश्वात्माने पञ्चमहाभूतोंकी समष्टिरूप विश्वका चिन्तन किया। उनके चिन्तन करते समय महासागर वायुरहित
तस्य चिन्तयमानस्य निर्वाते संस्थितेऽर्णवे।<br>निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गह्वरे॥ ३होनेके कारण शान्त था। आकाशका विनाश हो गया था, सर्वत्र जल-ही-जल व्याप्त था, उसके गह्वरमें सूक्ष्म जगत् विद्यमान था, उस समय जलके मध्यमें स्थित
ईषत् संक्षोभयामास सोऽर्णवं सलिलाश्रयः।<br>अनन्तरोर्मिभिः सूक्ष्ममथ छिद्रमभूत् पुरा॥ ४नारायणने उस एकार्णवको थोड़ा संक्षुब्ध कर दिया। तदनन्तर उससे उठी हुई लहरोंसे सर्वप्रथम सूक्ष्म छिद्र प्रकट हुआ। छिद्रसे शब्द-गुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ।
शब्दं प्रति तदोद्भूतो मारुतश्छिद्रसम्भवः।<br>स लब्ध्वान्तरमक्षोभ्यो व्यवर्धत समीरणः॥ ५उस छिद्राकाशसे वायुकी उत्पत्ति हुई। वह दुर्धर्ष पवन अवसर पाकर वृद्धिको प्राप्त हुआ। तब वेगपूर्वक बढ़ते हुए उस बलवान् पवनने महासागरको विक्षुब्ध कर दिया।
विवर्धता बलवता वेगाद् विक्षोभितोऽर्णवः।<br>तस्यार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन्नम्भसि मन्थिते।<br>कृष्णवर्त्मा समभवत् प्रभुर्वैश्वानरो महान्॥ ६उस क्षुब्ध हुए महासागरके जलके मथित होनेपर महान् प्रभावशाली कृष्णवर्त्मा वैश्वानर (अग्नि) प्रकट हुए। तब उस अग्निने अधिकांश जलको सोख लिया। समुद्र-
ततः स शोषयामास पावकः सलिलं बहु।<br>क्षयाज्जलनिधेश्चिद्रमभवद्विस्तृतं नभः॥ ७जलके संकुचित हो जानेसे वह छिद्र विस्तृत आकाशके रूपमें परिणत हो गया। इस प्रकार अपने तेजसे उत्पन्न
आत्मतेजोद्भवाः पुण्या आपोऽमृतरसोपमाः।<br>आकाशं छिद्रसम्भूतं वायुराकाशसम्भवः॥ ८हुए एवं अमृत-रसके समान स्वादिष्ट पुण्यमय जल, छिद्रसे उत्पन्न हुए आकाश, आकाशसे प्रकट हुए पवन
आभ्यां सङ्घर्षणोद्भूतं पावकं वायुसम्भवम्।<br>दृष्ट्वा प्रीतो महादेवो महाभूतविभावनः॥ ९तथा आकाश और पवनके संघर्षसे उद्भूत हुए वायुजनित अग्निको देखकर महाभूतोंको उत्पन्न करनेवाले वे महान् देव प्रसन्न हो गये। तब विविध रूप धारण करनेवाले
दृष्ट्वा भूतानि भगवाँल्लोकसृष्ट्यर्थमुत्तमम्।<br>ब्रह्मणो जन्मसहितं बहुरूपो व्यचिन्तयत्॥ १०भगवान् उन महाभूतोंको उपस्थित देखकर लोककी सृष्टिके लिये ब्रह्माके जन्मसहित अन्यान्य उत्तम साधनोंके विषयमें विशेषरूपसे विचार करने लगे॥ १—१०॥
चतुर्युगाभिसंख्याते सहस्रयुगपर्यये।<br>बहुजन्मविशुद्धात्मा ब्रह्मणोह निरुच्यते॥ ११इस प्रकार चारों युगोंकी संख्यासे युक्त एक हजार युग बीत जानेपर बारम्बार जन्म लेनेपर भी जिसका आत्मा विशुद्ध होता है, उसे ब्रह्मा कहा जाता है।
यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम्।<br>ज्ञानं दृष्टं तु विश्वार्थे योगिनां याति मुख्यताम्॥ १२योगवेत्ता भगवान् भूतलपर जिसे तपस्यासे पवित्र आत्मावाले महर्षियोंके ज्ञान और योगियोंकी मुख्यतासे युक्त देखते