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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 701 of 1098

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Page 701

* अध्याय १६६ * ६९१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सहस्रवृष्टिः शतधा भूत्वा कृष्णो महाबलः।<br>दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम्॥ १५<br><br>ततः क्षीरनिकायेन स्वादुना परमाम्भसा।<br>शिवेन पुण्येन मही निर्वाणमगमत्परम्॥ १६<br><br>तेन रोधेन संछन्ना पयसां वर्षतो धरा।<br>एकार्णवजलीभूता सर्वसत्त्वविवर्जिता॥ १७हैं। तदुपरान्त महाबली विष्णु सैकड़ों-हजारों प्रकारकी वृष्टिका रूप धारण कर दिव्य जलरूपी हविसे पृथ्वीको तृप्त कर देते हैं। तब उस दूध-सदृश स्वादिष्ट कल्याणकारक पुण्यमय उत्तम जलसे पृथ्वी परम शान्त हो जाती है। बरसते हुए जलके उस घेरेसे आच्छादित हुई पृथ्वी समस्त प्राणियोंसे रहित हो एकार्णवके जलके रूपमें परिणत हो जाती है॥ ९-१७॥
महासत्त्वान्यपि विभुं प्रविष्टान्यमितौजसम्।<br>नष्टार्कपवनाकाशे सूक्ष्मे जगति संवृते॥ १८<br><br>संशोषमात्मना कृत्वा समुद्रानपि देहिनः।<br>दग्ध्वा सम्प्लाव्य च तथा स्वपित्येकः सनातनः॥ १९<br><br>पौराणं रूपमास्थाय स्वपित्यमितविक्रमः।<br>एकार्णवजलव्यापी योगी योगमुपाश्रितः॥ २०<br><br>अनेकानि सहस्राणि युगान्येकार्णवाम्भसि।<br>न चैनं कश्चिदव्यक्तं व्यक्तं वेदितुमर्हति॥ २१<br><br>कश्चैव पुरुषो नाम किं योगः कश्च योगवान्।<br>असौ कियन्तं कालं च एकार्णवविधिं प्रभुः।<br>करिष्यतीति भगवानिति कश्चिन्न बुध्यते॥ २२<br><br>न द्रष्टा नैव गमिता न ज्ञाता नैव पार्श्वगः।<br>तस्य न ज्ञायते किंचित्तमृते देवसत्तमम्॥ २३<br><br>नभः क्षितिं पवनमपः प्रकाशं<br>प्रजापतिं भुवनधरं सुरेश्वरम्।<br>पितामहं श्रुतिनिलयं महामुनिं<br>प्रशाम्य भूयः शयनं ह्यरोचयत्॥ २४उस समय सूर्य, वायु और आकाशके नष्ट हो जानेपर तथा सूक्ष्म जगत्के आच्छादित हो जानेपर महान्-से-महान् जीव-जन्तु भी अमित ओजस्वी एवं सर्वव्यापी नारायणमें प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार वे सनातन भगवान् स्वयं अपने द्वारा समुद्रोंको सुखाकर, देहधारियोंको जलाकर तथा पृथ्वीको जलमें निमग्न करके अकेले शयन करते हैं। अमित पराक्रमी, एकार्णवके जलमें व्याप्त रहनेवाले एवं योगबलसम्पन्न नारायण योगका आश्रय ले उस एकार्णवके जलमें अपना पुराना रूप धारण कर अनेकों हजार युगोंतक शयन करते हैं। उस समय कोई भी इन अव्यक्त नारायणको व्यक्तरूपसे नहीं जान सकता। वह पुरुष कौन है ? उसका क्या योग है ? वह किस योगसे युक्त है ? वे सामर्थ्यशाली भगवान् कितने समयतक इस एकार्णवके विधानको करेंगे ? इसे कोई नहीं जानता। उस समय न कोई उन्हें देख सकता है, न कोई वहाँ जा सकता है, न कोई उन्हें जान सकता है और न कोई उनके निकट पहुँच सकता है। उन देवश्रेष्ठके अतिरिक्त दूसरा कोई भी उनके विषयमें कुछ भी नहीं जान सकता। इस प्रकार आकाश, पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, प्रजापति, पर्वत, सुरेश्वर, पितामह ब्रह्मा, वेदसमूह और महर्षि—इन सबको प्रशान्त कर वे पुनः शयनकी इच्छा करते हैं॥ १८-२४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे षट्पष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ छाठठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६६॥