मत्स्य महापुराण

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| ६९० | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ छाछठवाँ अध्याय
महाप्रलयका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मत्स्य उवाच<br><br>भूत्वा नारायणो योगी सत्त्वमूर्तिर्विभावसुः।<br>गभस्तिभिः प्रदीप्ताभिः संशोषयति सागरान्॥ १<br><br>ततः पीत्वार्णवान् सर्वान् नदीः कूपांश्च सर्वशः।<br>पर्वतानां च सलिलं सर्वमादाय रश्मिभिः॥ २<br><br>भित्त्वा गभस्तिभिश्चैव महीं गत्वा रसातलम्।<br>पातालजलमादाय पिबते रसमुत्तमम्॥ ३<br><br>मूत्रासृक् क्लेदमन्यच्च यदस्ति प्राणिषु ध्रुवम्।<br>तत्सर्वमरविन्दाक्ष आदत्ते पुरुषोत्तमः॥ ४<br><br>वायुश्च भगवान् भूत्वा विधुन्वानोऽखिलं जगत्।<br>प्राणापानसमानाद्यान् वायूनाकर्षते हरिः॥ ५<br><br>ततो देवगणाः सर्वे भूतान्येव च यानि तु।<br>गन्धो घ्राणं शरीरं च पृथिवीं संश्रिता गुणाः॥ ६<br><br>जिह्वा रसश्च स्नेहश्च संश्रिताः सलिले गुणाः।<br>रूपं चक्षुर्विपाकश्च ज्योतिरेवाश्रिता गुणाः॥ ७<br><br>स्पर्शः प्राणश्च चेष्टा च पवने संश्रिता गुणाः।<br>शब्दः श्रोत्रं च खान्येव गगने संश्रिता गुणाः॥ ८<br><br>लोकमाया भगवता मुहूर्तेन विनाशिता। | मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! तदनन्तर वे सत्त्वमूर्ति योगी नारायण सूर्यका रूप धारण कर अपनी उद्दीप्त किरणोंसे सागरोंको सोख लेते हैं। इस प्रकार सभी सागरोंको सुखा देनेके पश्चात् अपनी किरणोंद्वारा नदियों, कुओं और पर्वतोंका सारा जल खींच लेते हैं। फिर वे किरणोंद्वारा पृथ्वीका भेदन करके रसातलमें जा पहुँचते हैं और वहाँ पातालके उत्तम रसरूप जलका पान करते हैं। तत्पश्चात् कमलनयन पुरुषोत्तम नारायण प्राणियोंके शरीरमें निश्चितरूपसे रहनेवाले मूत्र, रक्त, मज्जा तथा अन्य जो गीले पदार्थ होते हैं, उन सबके रसको ग्रहण कर लेते हैं। तदुपरान्त भगवान् श्रीहरि वायुरूप होकर सम्पूर्ण जगत्को प्रकम्पित करते हुए प्राण, अपान, समान, उदान और व्यानरूप पाँचों प्राणवायुओंको खींच लेते हैं। तदनन्तर सभी देवगण, पाँचों महाभूत, गन्ध, घ्राण, शरीर—ये सभी गुण पृथ्वीमें विलीन हो जाते हैं। जिह्वा, रस, स्नेह (चिकनाहट)—ये सभी गुण जलमें लीन हो जाते हैं। रूप, चक्षु, विपाक (परिणाम)—ये गुण अग्निमें मिल जाते हैं। स्पर्श, प्राण, चेष्टा—ये सभी गुण वायुका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं। शब्द, श्रोत्र, इन्द्रियाँ—ये सभी गुण आकाशमें विलीन हो जाते हैं। इस प्रकार भगवान् नारायण दो ही घड़ीमें सारी लोकमायाको विनष्ट कर देते हैं॥ १—८ १/२ ॥ |
| मनो बुद्धिश्च सर्वेषां क्षेत्रज्ञश्चेति यः श्रुतः॥ ९<br><br>तं वरेण्यं परमेष्ठी हृषीकेशमुपाश्रितः।<br>ततो भगवतस्तस्य रश्मिभिः परिवारितः॥ १०<br><br>वायुनाक्रम्यमाणासु द्रुमशाखासु चाश्रितः।<br>तेषां संघर्षणोद्भूतः पावकः शतधा ज्वलन्॥ ११<br><br>अदहच्च तदा सर्वं वृतः संवर्तकोऽनलः।<br>सपर्वतद्रुमान् गुल्माँल्लतावल्लीस्तृणानि च॥ १२<br><br>विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च।<br>यानि चाश्रयणीयानि तानि सर्वाणि सोऽदहत्॥ १३<br><br>भस्मीकृत्य ततः सर्वांल्लोकाँल्लोकगुरुर्हरिः।<br>भूयो निर्वापयामास युगान्तेन च कर्मणा॥ १४ | तदनन्तर जो सभी प्राणियोंका मन, बुद्धि और क्षेत्रज्ञ कहा जाता है, वह अग्नि उन सर्वश्रेष्ठ हृषीकेशके निकट पहुँचता है और उन भगवान्की किरणोंसे युक्त हो वायुद्वारा आक्रान्त वृक्षोंकी शाखाओंका आश्रय ग्रहण करता है। वहाँ वृक्षोंके संघर्षसे उत्पन्न हुई वह अग्नि सैकड़ों ज्वालाएँ फेंकने लगती है। फिर उससे घिरा हुआ संवर्तक अग्नि सबको जलाना आरम्भ करती है। वह पर्वतीय वृक्षोंसहित गुल्मों, लताओं, वल्लियों, घास-फूसों, दिव्य विमानों, अनेकों नगरों तथा अन्यान्य जो आश्रय लेनेयोग्य स्थान होते हैं, उन सबको जलाकर भस्म कर देती है। इस प्रकार लोकोंके गुरुस्वरूप श्रीहरि समस्त लोकोंको जलाकर पुनः युगान्तकालिक कर्मद्वारा समूची सृष्टिका विनाश कर देते |