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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 688 of 1098

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Page 688
६७८* मत्स्यपुराण *

एक सौ तिरसठवाँ अध्याय

नरसिंह और हिरण्यकशिपुका भीषण युद्ध, दैत्योंको उत्पातदर्शन, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा ब्रह्माद्वारा नरसिंहकी स्तुति


सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
खरश्वानमुखाश्चैव मकराशीविषाननाः।<br>ईहामृगमुखाश्चान्ये वराहमुखसंस्थिताः॥ १<br><br>बालसूर्यमुखाश्चान्ये धूमकेतुमुखास्तथा।<br>अर्धचन्द्रार्धवक्त्राश्च अग्निदीप्तमुखास्तथा॥ २<br><br>हंसकुक्कुटवक्त्राश्च व्यादितास्या भयावहाः।<br>सिंहास्या लेलिहानाश्च काकगृध्रमुखास्तथा॥ ३<br><br>द्विजिव्हाका वक्रशीर्षास्तथोल्कामुखसंस्थिताः।<br>महाग्राहमुखाश्चान्ये दानवा बलदर्पिताः॥ ४<br><br>शैलसंवर्ष्मणस्तस्य शरीरे शरवृष्टिभिः।<br>अवध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथां चक्रुराहवे॥ ५<br><br>एवं भूयो परान् घोरानसृजन् दानवेश्वराः।<br>मृगेन्द्रस्योपरि क्रुद्धा निःश्वसन्त इवोरगाः॥ ६<br><br>ते दानवशरा घोरा दानवेन्द्रसमीरिताः।<br>विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते॥ ७<br><br>ततश्चक्राणि दिव्यानि दैत्याः क्रोधसमन्विताः।<br>मृगेन्द्रायासृजन्नाशु ज्वलितानि समन्ततः॥ ८<br><br>तैरासीद् गगनं चक्रैः सम्पतद्भिरितस्ततः।<br>युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रादित्यग्रहैरिव॥ ९<br><br>तानि सर्वाणि चक्राणि मृगेन्द्रेण महात्मना।<br>ग्रस्तान्युदीर्णानि तदा पावकार्चिःसमानि वै॥ १०<br><br>तानि चक्राणि वदने विशमानानि भान्ति वै।<br>मेघोदरदरीष्वेव चन्द्रसूर्यग्रहा इव॥ ११ऋषियो! उन दानवोंमें किन्हींके मुख गधे और कुत्तेके समान थे तो कुछ मकर और सर्पके-से मुखवाले थे। किन्हींके मुख भेड़िया-सदृश तो कुछके सूअर-जैसे थे। कुछ उदयकालीन सूर्यके समान तो कुछ धूमकेतु-से मुखवाले थे। किन्हींके मुख अर्धचन्द्र तथा किन्हींके अग्निकी तरह उद्दीप्त थे। किन्हींका मुख आधा ही था। किन्हींके मुख हंस और मुर्गेके समान थे। किन्हींके मुख फैले हुए थे, जो बड़े भयावने लग रहे थे। कुछ सिंहके-से मुखवाले दानव जीभ लपलपा रहे थे। किन्हींके मुख कौओं और गीधों-जैसे थे। किन्हींके मुखमें दो जिह्वाएँ थीं, किन्हींके मस्तक टेढ़े थे और कुछ उल्का-सरीखे मुखवाले थे। किन्हींके मुख महाग्राह-सदृश थे। इस प्रकार वे बलाभिमानी दानव रणभूमिमें पर्वतके समान सुदृढ़ शरीरवाले उन अवध्य मृगेन्द्रके शरीरपर बाणोंकी वृष्टि करके उन्हें पीड़ित न कर सके। तब क्रुद्ध हुए सर्पकी भाँति निःश्वास छोड़ते हुए वे दानवेश्वर नरसिंहके ऊपर पुनः दूसरे भयंकर बाणोंकी वृष्टि करने लगे, परंतु दानवेश्वरोंद्वारा छोड़े गये वे भयंकर बाण उसी प्रकार आकाशमें विलीन हो जाते थे, जैसे पर्वतपर चमकते हुए जुगनू। तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए दैत्य शीघ्र ही नरसिंहके ऊपर चारों ओरसे चमकते हुए दिव्य चक्रोंकी वर्षा करने लगे। इधर-उधर गिरते हुए उन चक्रोंसे आकाशमण्डल ऐसा दीख रहा था, मानो युगान्तके समय प्रकाशित हुए चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त हो गया हो। अग्निकी लपटोंके समान उठते हुए उन सभी चक्रोंको महात्मा नरसिंह निगल गये। उस समय उनके मुखमें प्रविष्ट होते हुए वे चक्र मेघोंकी घनघोर घटामें घुसते हुए चन्द्र, सूर्य एवं अन्यान्य ग्रहोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे॥ १—११॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम्।<br>शक्तिं प्रज्वलितां घोरां धौतशस्त्रतडित्प्रभाम्॥ १२तदनन्तर दैत्यराज हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर पुनः अपनी भयंकर शक्ति छोड़ी, जो चमकीली, अत्यन्त शक्तिशाली और धुली होनेके कारण बिजली-सी चमक