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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 687 of 1098

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Page 687
  • अध्याय १६२ * | ६७७
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| अस्त्रैः प्रज्वलितैः सिंहमावृणोदसुरोत्तमः।<br>विवस्वान् घर्मसमये हिमवन्तमिवांशुभिः॥ २९<br>स ह्यामर्षानिलोद्भूतो दैत्यानां सैन्यसागरः।<br>क्षणेन प्लावयामास मैनाकमिव सागरः॥ ३०<br>प्रासैः पाशैश्च खड्गैश्च गदाभिर्मुसलैस्तथा।<br>वज्रैरशनिभिश्चैव साग्निभिश्च महाद्रुमैः॥ ३१<br>मुद्गरैर्भिन्दिपालैश्च शिलोलूखलपर्वतैः।<br>शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिर्दण्डैरपि सुदारुणैः॥ ३२<br>ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता<br>महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः।<br>समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुकायाः<br>स्थितास्त्रिशीर्षा इव नागपाशाः॥ ३३<br>सुवर्णमालाकुलभूषिताङ्गाः<br>पीतांशुकाभोगविभाविताङ्गाः।<br>मुक्तावलीदामसनाथकक्षा<br>हंसा इवाभान्ति विशालपक्षाः॥ ३४<br>तेषां तु वायुप्रतिमौजसां वै<br>केयूरमौलीबलयोत्कटानाम्।<br>तान्युत्तमाङ्गान्युभितो विभान्ति<br>प्रभातसूर्यांशुसमप्रभाणि ॥ ३५<br>क्षिपद्भिरुग्रैर्ज्वलितैर्महाबलै-<br>र्महास्त्रपूगैः सुसमावृत्तो बभौ।<br>गिरिर्यथा संततवर्षिभिर्घनैः<br>कृतान्धकारान्तरकन्दरो द्रुमैः॥ ३६<br>तैर्हन्यमानोऽपि महास्त्रजालै-<br>र्महाबलैर्दैत्यगणैः समेतैः।<br>नाकम्पताजौ भगवान् प्रताप-<br>स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः॥ ३७<br>संत्रासितास्तेन नृसिंहरूपिणा<br>दितेः सुताः पावकतुल्यतेजसा।<br>भयाद् विचेलुः पवनोद्धुताङ्गा<br>यथोर्मयः सागरवारिसम्भवाः॥ ३८ | उस असुरश्रेष्ठने नरसिंहको प्रज्वलित अस्त्रोंद्वारा ऐसा आच्छादित कर दिया, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें सूर्य अपनी किरणोंसे हिमवान् पर्वतको ढक लेते हैं। दैत्योंका वह सेनारूपी सागर क्रोधरूपी वायुसे उच्छ्वलित हो उठा और क्षणमात्रमें ही वहाँकी भूमिपर इस प्रकार छा गया, जैसे सागर मैनाक पर्वतको डुबाकर उबल उठा था। फिर तो वे भाला, पाश, तलवार, गदा, मुसल, वज्र, अग्निसहित अशनि, विशाल वृक्ष, मुद्गर, भिन्दिपाल, शिला, ओखली, पर्वत, प्रज्वलित शतघ्नी (तोप) और अत्यन्त भीषण दण्डसे नरसिंहपर प्रहार करने लगे॥ २९-३२॥<br><br>उस समय महेन्द्रके वज्र एवं अशनिके समान वेगशाली वे दानव हाथमें पाश लिये हुए चारों ओर अपनी भुजाओं और शरीरोंको ऊपर उठाये हुए स्थित थे, जो तीन शिखावाले नागपाशकी तरह दीख रहे थे। उनके शरीर सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे, उनके अङ्गोंपर पीला रेशमी वस्त्र शोभा पा रहा था तथा कटिबंध मोतियोंकी लड़ियोंसे संयुक्त थे, जिससे वे विशाल पंखधारी हंसकी भाँति शोभा पा रहे थे। केयूर, मुकुट और कंकणसे सुशोभित उन उत्कट पराक्रमी एवं वायुके समान ओजस्वी दानवोंके मस्तक प्रातःकालीन सूर्यकी किरणोंकी कान्ति-सदृश चमक रहे थे। उन महाबली दानवोंद्वारा चलाये गये भयंकर एवं उद्दीप्त महान् अस्त्रसमूहोंसे आच्छादित हुए भगवान् नरसिंह उसी प्रकार शोभा पा रहे थे, मानो निरन्तर वर्षा करनेवाले बादलों और वृक्षोंसे अन्धकारित किये गये गुफाओंसे युक्त पर्वत हो। संगठित हुए उन महाबली दैत्योंद्वारा महान् अस्त्रसमूहोंसे आघात किये जानेपर भी प्रतापशाली भगवान् नरसिंह युद्धस्थलमें विचलित नहीं हुए, अपितु प्रकृतिसे अटल रहनेवाले हिमवान्की तरह अडिग होकर डटे रहे। अग्निके समान तेजस्वी नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा डराये गये दैत्यगण भयके कारण उसी प्रकार विचलित हो गये, जैसे समुद्रके जलमें उठी हुई लहरें वायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हो जाती हैं॥ ३३-३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नारसिंहप्रादुर्भावो नाम द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नारसिंहप्रादुर्भाव नामक एक सौ बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६२ ॥