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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 659 of 1098

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Page 659
* अध्याय १५४ *६४९

| नित्यमाराधितः श्रीमान् पृथुमूलः समुन्नतः ।<br>नाकरोत् सेवितुं मेरुरुपहारं पतिष्यतः ॥ ५७५<br><br>जलेऽप्येषा व्यवस्थेति संशयेताखिलं बुधः ।<br>दिनान्तानुगतो भानुः स्वजनत्वमपूरयत् ॥ ५७६<br><br>संध्याबद्धाञ्जलिपुटा मुनयोऽभिमुखा रविम् ।<br>याचन्त्यागमनं शीघ्रं निवार्यात्मनि भाविताम् ॥ ५७७<br><br>व्यजृम्भदथ लोकेऽस्मिन् क्रमाद् वैभावरं तमः ।<br>कुटिलस्येव हृदये कालुष्यं दूषयन्मनः ॥ ५७८ | नित्य सूर्यद्वारा आराधित, शोभाशाली, स्थूल मूल भागवाले एवं समुन्नत मेरुने गिरते हुए सूर्यकी सेवा करनेके लिये कोई उपहार नहीं समर्पित किया। जलमें भी यही व्यवस्था है—इन सभी विषयोंपर बुद्धिमान् पुरुष संशय करेंगे। दिनके अवसानका अनुगमन करनेवाले सूर्यने अपनत्वकी पूर्ति की। संध्याके समय हाथ जोड़े हुए मुनिगण सूर्यके सम्मुख उपस्थित हो आत्मामें उत्पन्न हुई (बिछोहकी) भावनाको रोककर पुनः शीघ्र ही आगमनकी याचना कर रहे हैं। इस प्रकार सूर्यके अस्त हो जानेपर सारे जगत्‌में रात्रिका अन्धकार क्रमशः उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे कुटिल मनुष्यके हृदयमें पाप मनको दूषित करते हुए फैल जाता है॥ ५७५—५७८ ॥ |
| ज्वलत्फणिफणारत्नदीपोद्द्योतितभित्तिके ।<br>शयनं शशिसङ्घातशुभवस्त्रोत्तरच्छदम् ॥ ५७९<br><br>नानारत्नद्युतिलसच्चक्रचापविडम्बकम् ।<br>रत्नकिङ्किणिकाजालं लम्बमुक्ताकलापकम् ॥ ५८०<br><br>कमनीयचलल्लोलवितानाच्छादिताम्बरम् ।<br>मन्दिरे मन्दसञ्चारः शनैर्गिरिसुतायुतः ॥ ५८१<br><br>तस्थौ गिरिसुताबाहुलतामीलितकन्धरः ।<br>शशिमौलिसितज्योत्स्नाशुचिपूरितगोचरः ॥ ५८२<br><br>गिरिजाप्यसितापाङ्गी नीलोत्पलदलच्छविः ।<br>विभावर्या च सम्पृक्ता बभूवातितमोमयी ।<br>तामुवाच ततो देवः क्रीडाकेलिकलायुतम् ॥ ५८३ | तत्पश्चात् जिसकी दीवालें प्रभापूर्ण सर्पोंकी मणिरूपी दीपकोंसे उद्भासित हो रही थीं, ऐसे भवनमें शय्या बिछी थी, जिसपर चाँदनीकी राशि-जैसी उज्ज्वल चादर बिछी थी, नाना प्रकारके रत्नोंकी कान्तिसे सुशोभित होनेके कारण वह इन्द्रधनुषकी विडम्बना कर रही थी, उसमें रत्ननिर्मित क्षुद्रघण्टिकाएँ तथा मोतियोंकी लम्बी-लम्बी झालरें लटक रही थीं और उसका ऊपरी भाग हिलते हुए कमनीय वितानसे आच्छादित था, ऐसी शय्यापर मन्दगतिसे चलते हुए भगवान् शंकर पार्वतीके साथ विराजमान हुए। उस समय उनका कंधा पार्वतीकी भुजलतासे संयुक्त था। चन्द्रभूषणकी उज्ज्वल एवं निर्मल प्रभा सर्वत्र फैल रही थी। कजरारे नेत्रोंवाली गिरिजाकी भी छवि नीले कमल-दलके समान थी। रात्रिसे संयुक्त होनेके कारण वे विशेषरूपसे तमोमयी दीख रही थीं। उस समय भगवान् शंकर पार्वतीसे क्रीडाकेलिकी कलासे युक्त वचन बोले ॥ ५७९—५८३ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे चतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भवमें एक सौ चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५४ ॥