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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 658 of 1098

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Page 658

६४८ * मत्स्यपुराण *


| भूतपा निर्झराम्भोनिपातेषु निमज्जत<br>पुष्पजालावनद्धेषु धामस्वपि शेत प्रोत्तुङ्ग।<br>नानाद्रिकुञ्जेष्वनुगर्जन्तु हेमा-<br>रुतास्फोटसंक्षेपणात्कामतः ॥ ५६७<br>काञ्चनोत्तुङ्गशृङ्गावरोहक्षितौ हेमरेणू-<br>त्करासङ्गद्युतिं खेचराणां वनाधायिनि।<br>रम्ये बहुरूपसम्पत्प्रकारे गणान्वासितं<br>मन्दरकन्दरे सुन्दरमन्दारपुष्पप्रवालाम्बुजे ॥ ५६८<br>सिद्धनारीभिरापीतरूपामृतं विस्तृतै-<br>र्नेत्रपात्रैरनुन्मेषिभिर्वीरकं ।<br>शैलपुत्री निमेषान्तरादस्मर-<br>त्पुत्रगृध्नी विनोदार्थिनी ॥ ५६९<br>सोऽपि तादृक्क्षणावाप्तपुण्योदयो<br>योऽपि जन्मान्तरस्यात्मजत्वं गतः<br>क्रीडतस्तस्य तृप्तिः कथं जायते<br>योऽपि भाविजगद्वेधसा तेजसः कल्पितः<br>प्रतिक्षणं दिव्यगीतक्षणो<br>नृत्यलोलो गणैशैः प्रणतः ॥ ५७०<br>क्षणं सिंहनादाकुले गण्डशैले<br>सृजद्रत्नजाले बृहत्सालताले।<br>क्षणं फुल्लनानातमालालिकाले<br>क्षणं वृक्षमूले विलोलो मराले ॥ ५७१<br>क्षणे स्वल्पपङ्के जले पङ्कजाढ्ये<br>क्षणं मातुरङ्के शुभे निष्कलङ्के।<br>परिक्रीडते बाललीलाविहारी<br>गणेशाधिपो देवतानन्दकारी<br>निकुञ्जेषु विद्याधरैर्गीतशीलः<br>पिनाकीव लीलाविलासैः सलीलः ॥ ५७२ | रक्षा करते हुए वन, पर्वत, निर्झर और अग्नियुक्त स्थानोंपर विचरण करते हुए झरनोंके जलप्रवाहमें मज्जन करो, पुष्पोंसे सुसज्जित भवनोंमें शयन करो और ऊँचे-ऊँचे विभिन्न पर्वतोंके कुँओंमें स्वेच्छानुसार झंझावातके अव्यक्त शब्दका अनुकरण करते हुए गर्जना करो। विनोदकी अभिलाषावाली पुत्रप्रेमी पार्वती ऊँचे स्वर्णमय शिखरोंकी ढालू भूमिसे युक्त, आकाशचारियोंकी रमणीय वनस्थलीरूप, अनेकों प्रकारकी सम्पत्तियोंसे परिपूर्ण तथा सुन्दर मन्दारपुष्प, प्रवाल और कमल-पुष्पोंसे सुशोभित मन्दराचलके खोहोंमें खेलते वीरकको जिसकी अङ्गकान्ति सुवर्णकी रेणु-सरीखी थी, सिद्धोंकी स्त्रियाँ जिसके रूपामृतका पान कर रही थीं और जो गणोंके साथ विराजमान था, क्षण-क्षणपर निमेषरहित विस्फारित नेत्रोंसे देखती हुई स्मरण करती रहती थीं। वीरकका भी उस समय जन्मान्तरका पुण्य उदय हो गया था, जिससे वह पार्वतीका पुत्र हो गया। ऐसी दशामें उसे खेलसे तृप्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? वह जगत्कर्ता ब्रह्माद्वारा तेजके भावी अंशसे कल्पित किया गया था। वह प्रतिक्षण दिव्य गीतोंको सुनता था और स्वयं भी चञ्चलतापूर्वक नृत्य करता था। गणेश्वर उसके सामने नतमस्तक रहते थे। वह चञ्चलतापूर्वक किसी क्षण सिंहनादसे व्याप्त, रत्नसमूहोंकी खानवाले तथा बड़े-बड़े साल और ताड़के वृक्षोंसे सुशोभित पर्वत-शिखरपर, किसी क्षण खिले हुए बहुत-से तमाल वृक्षोंसे युक्त होनेके कारण काले दीखनेवाले वनोंमें, किसी क्षण राजहंसपर चढ़कर, किसी क्षण कमलसे भरे हुए थोड़े कीचड़ और जलवाले सरोवरमें तथा किसी क्षण माताकी निष्कलंक सुन्दर गोदमें बैठकर क्रीडा करता था। इस प्रकार देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाला एवं गणेश्वरोंका भी अधिपति वह बाललीलाबिहारी वीरक निकुञ्जोंमें विद्याधरोंके साथ गान करता और शंकरजीकी तरह लीलाविलाससे युक्त हो क्रीडा करता था॥ ५६६–५७२॥ |
| प्रकाशय भुवनाभोगी ततो दिनकरे गते।<br>देशान्तरं तदा पश्चाद् दूरमस्तावनीधरम् ॥ ५७३ | तदनन्तर भगवान् सूर्य सारे भुवनोंको प्रकाशित करनेके पश्चात् सायंकाल अस्ताचलकी ओर प्रस्थित हुए। |
| उदयास्ते पुरो भावी यो हि चास्तेऽवनीधरः।<br>मित्रत्वमस्य सुदृढं हृदये परिचिन्त्यताम् ॥ ५७४ | उदयाचल और अस्ताचल—ये दोनों पर्वत पूर्वकालकी निश्चित योजनाके अनुसार स्थित हैं। इनमें सूर्यकी अस्ताचलके साथ सुदृढ़ मित्रता है—ऐसा विचारकर |

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