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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 644 of 1098

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Page 644
६३४* मत्स्यपुराण *

| शर्व उवाच<br>जाने लोकविधानस्य कन्यासत्कार्यमुत्तमम्।<br>जाता प्रालेयशैलस्य संकेतकनिरूपणा॥ ४०६<br>सत्यमुत्कण्ठिताः सर्वे देवकार्यार्थमुद्यताः।<br>तेषां त्वरन्ति चेतांसि किंतु कार्यं विवक्षितम्॥ ४०७<br>लोकयात्रानुगन्तव्या विशेषेण विचक्षणैः।<br>सेवन्ते ते यतो धर्मं तत्प्रामाण्यात्परे स्थिताः॥ ४०८<br>इत्युक्ता मुनयो जग्मुस्त्वरितास्तु हिमाचलम्।<br>तत्र ते पूजितास्तेन हिमशैलेन सादरम्।<br>ऊचुर्मुनिवराः प्रीताः स्वल्पवर्णं त्वरान्विताः॥ ४०९ | शङ्करजीने कहा— मुनिवरो! जगत्के कल्याणके लिये किये जाते हुए कन्याके उस उत्तम सत्कार्यको मैं जानता हूँ। वह कन्या हिमाचलकी पुत्रीरूपमें उत्पन्न हुई है। आपलोग उसीके संयोग-प्रस्तावका निरूपण कर रहे हैं। यह सत्य है कि सभी लोग देवकार्यकी सिद्धिके हेतु उत्सुक और उद्यत हैं, इसीसे उनके चित्त उतावलीसे भर गये हैं, किंतु यह कार्य कुछ कालकी अपेक्षा कर रहा है अर्थात् इसके पूर्ण होनेमें कुछ विलम्ब है। विद्वानोंको विशेषरूपसे लोकव्यवहारका निर्वाह करना चाहिये; क्योंकि वे जिस धर्मका सेवन करते हैं, वही दूसरोंके लिये प्रमाणरूप बन जाता है। ऐसा कहे जानेपर मुनिगण तुरंत ही हिमाचलके पास चल दिये। वहाँ पहुँचनेपर हिमाचलने उनकी आदरपूर्वक आवभगत की। तब प्रसन्न हुए मुनिवर शीघ्रतापूर्वक थोड़े शब्दोंमें (इस प्रकार) बोले॥ ४०६–४०९॥ |
| मुनय ऊचुः<br>देवो दुहितरं साक्षात्पिनाकी तव मार्गते।<br>तच्छीघ्रं पावयात्मानमाहुत्येवानलार्पणात्॥ ४१०<br>कार्यमेतच्च देवानां सुचिरं परिवर्तते।<br>जगदुद्धरणायैष क्रियतां वै समुद्यमः॥ ४११<br>इत्युक्तस्तैस्तदा शैलो हर्षाविष्टोऽवदन्मुनीन्।<br>असमर्थोऽभवद् वक्तुमुत्तरं प्रार्थयच्छिवम्॥ ४१२<br>ततो मेना मुनीन् वन्द्य प्रोवाच स्नेहविक्लवा।<br>दुहितुस्तान् मुनींश्चैव चरणाश्रयमर्थवित्॥ ४१३ | मुनियोंने कहा— पर्वतराज! पिनाकधारी साक्षात् महादेव आपकी कन्याको प्राप्त करना चाहते हैं, अतः अग्निमें पड़ी हुई आहुतिकी तरह उसे शीघ्र ही उन्हें प्रदान करके अपने आत्माको पवित्र कर लीजिये। देवताओंका यह कार्य चिरकालसे चला आ रहा है, अतः जगत्का उद्धार करनेके लिये आप इस उद्योगको शीघ्र सम्पन्न कीजिये। मुनियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस समय हिमाचल हर्षविभोर हो मुनियोंको उत्तर देनेके लिये उद्यत हुए; किंतु जब उत्तर देनेमें असमर्थ हो गये, तब मन-ही-मन शङ्करजीसे प्रार्थना करने लगे। तत्पश्चात् प्रयोजनको समझनेवाली मेनाने मुनियोंको प्रणाम किया और पुत्रीके स्नेहसे व्याकुल हुई वह उन मुनियोंके चरणोंके निकट स्थित हो इस प्रकार बोली॥ ४१०–४१३॥ |
| मेनोवाच<br>यदर्थं दुहितुर्जन्म नेच्छन्त्यपि महाफलम्।<br>तदेवोपस्थितं सर्वं प्रक्रमेणैव साम्प्रतम्॥ ४१४<br>कुलजन्मवयोरूपविभूत्यार्द्धियुतोऽपि यः।<br>वरस्तस्यापि चाहूय सुता देया हयाचतः॥ ४१५<br>तत्समस्ततपो घोरं कथं पुत्री प्रयास्यति।<br>पुत्रीवाक्याद्यदत्रास्ति विधेयं तद्विधीयताम्॥ ४१६ | मेनाने कहा— मुनिवरो! जिन कारणोंसे लोग महान् फलदायक होनेपर भी कन्याके जन्मकी इच्छा नहीं करते, वही सब इस समय परम्परासे मेरे सामने आ उपस्थित हुआ है। (विवाहकी प्रथा तो यह है कि) जो वर उत्तम कुल, जन्म, अवस्था, रूप, ऐश्वर्य और सम्पत्तिसे भी युक्त हो, उसे अपने घर बुलाकर कन्या प्रदान करनी चाहिये, किंतु कन्याकी याचना करनेवालेको नहीं। भला बताइये, इस प्रकार समस्त घोर तपोंको करनेवाले वरके साथ मेरी पुत्री कैसे जायगी। इसलिये इस विषयमें मेरी पुत्रीके कथनानुसार जो उचित हो, वही आपलोग करें। |