Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 643 of 1098

Read in context
Page 643
* अध्याय १५४ *६३३

| जयत्यसौ धन्यतरो हिमाचल-<br>स्तदाश्रयं यस्य सुता तपस्यति।<br>स दैत्यराजोऽपि महाफलोदयो<br>विमूलिताशेषसुरो हि तारकः॥ ३९८<br>त्वदीयमंशं प्रविलोक्य कल्मषात्<br>स्वकं शरीरं परिमोक्ष्यते हि यः।<br>स धन्यधीर्लोकपिता चतुर्मुखो<br>हरिश्च यत्सम्भ्रमवह्निदीपितः॥ ३९९<br>त्वदङ्घ्रियुग्मं हृदयेन बिभ्रतो<br>महाभितापप्रशमैकहेतुकम्।<br>त्वमेव चैको विविधक्रतुक्रियः<br>किलेति वाचा विधुरैर्विभाष्यते॥ ४००<br>अथाद्य एकस्त्वमवैषि नान्यथा<br>जगत्तथा निर्घृणतां तव स्पृशेत्।<br>न वेत्सि वा दुःखमिदं भवात्मकं<br>विहन्यते ते खलु सर्वतः क्रिया॥ ४०१<br>उपेक्षसे चेज्जगतामुपद्रवं<br>दयामयत्वं तव केन कथ्यते।<br>स्वयोगमायामहिमागुहाश्रयं<br>न विद्यते निर्मलभूतिगौरवम्॥ ४०२<br>वयं च ते धन्यतमाः शरीरिणां<br>यदीदृशं त्वां प्रविलोकयामहे।<br>अदर्शनं तेन मनोरथो यथा<br>प्रयाति साफल्यतया मनोगतम्॥ ४०३<br>जगद्विधानैकविधौ जगन्मुखे<br>करिष्यसेऽतो बलभिच्चरा वयम्।<br>विनेमुरित्थं मुनयो विसृज्य तां<br>गिरं गिरीशश्रुतिभूमिसन्निधौ।<br>उत्कृष्टकेदार इवावनीतले<br>सुबीजमुष्टिं सुफलाय कर्षकाः॥ ४०४ | इस धन्यवादके पात्र हिमाचलकी जय हो, जिनके आश्रयमें रहकर उनकी कन्या तपस्या कर रही है। सम्पूर्ण देवताओंको उखाड़ फेंकनेवाले दैत्यराज तारकके भी महान् पुण्यफलका उदय हो गया है, जो आपके अंशसे उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर पापसे निर्मुक्त हो अपने शरीरका परित्याग करेगा। लोकपिता चतुर्मुख ब्रह्माकी तथा तारकके भयरूपी अग्निसे संतप्त श्रीहरिकी भी बुद्धि धन्य है, जो महान् संतापके प्रशमनके लिये एकमात्र कारणभूत आपके दोनों चरणोंको अपने हृदयमें धारण करते हैं। एकमात्र आप ही अनेकविध दुरूह कार्योंको सम्पन्न करनेवाले हैं, दुःखी लोग आपका ऐसा विरद गाते हैं। इसे अकेले आप ही जानते हैं, अतः इसके विपरीत कोई ऐसा कार्य न कीजिये, जिससे जगत्को आपकी निर्दयताका अनुभव होने लगे। अथवा यदि आप इस सांसारिक दुःखकी ओर ध्यान नहीं देते तो आपकी सर्वतोमुखी क्रिया लुप्त होने जा रही है। यदि आप इस प्रकार जगत्के उपद्रवकी उपेक्षा कर दे रहे हैं तो किसलिये आपको दयामय कहा जा सकता है। साथ ही अपनी योगमायाकी महिमारूपी गुफामें स्थित रहनेवाला आपके निर्मल ऐश्वर्यका गौरव भी विद्यमान नहीं रह सकता। शरीरधारियोंमें हमलोग भी अतिशय धन्यवादके पात्र हैं, जो इस प्रकार आपका दर्शन कर रहे हैं। इसलिये हमारा मनोरथ नष्ट नहीं होना चाहिये। आप जगत्की रक्षाके विधानमें जगत्के लिये ऐसा करें जिससे हमारे मनोगत भाव सफल हो जायँ। हमलोग देवराज इन्द्रके दूत बनकर आये हैं। ऐसा कहकर वे मुनिगण शङ्करजीके चरणोंमें अवनत हो गये। उस समय उन्होंने शङ्करजीके कानरूपी भूमिके निकट उस वाणीरूपी बीजको इस प्रकार छींट दिया था, जैसे किसानलोग भलीभाँति जोती हुई भूमिपर अच्छे फलकी प्राप्तिके निमित्त उत्तम बीजकी मूँठ डाल देते हैं॥ ३९७-४०४॥ |
| तेषां श्रुत्वा ततो रम्यां प्रक्रमोपक्रमक्रियाम्।<br><br>वाचं वाचस्पतिरिव प्रोवाच स्मितसुन्दरः॥ ४०५ | तदनन्तर उन मुनियोंकी सिलसिलेवार योजनासे युक्त मनोहर वाणीको सुनकर भगवान् शङ्करके मुखपर मुसकानकी छटा बिखर गयी। तब वे बृहस्पतिकी तरह सान्त्वनापूर्ण वचन बोले॥ ४०५॥ |