मत्स्य महापुराण

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| ६१४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अयुक्तमथ वक्तव्यमप्राप्यमपि साम्प्रतम्।<br>अनुग्रहेण मे छिन्धि दुःखं कन्याश्रयं मुने॥ १६१॥<br><br>परिच्छिन्नेऽप्यसंदिग्धे मनः परिभवाश्रयम्।<br>तृष्णामुष्णातिनिष्णाता फललोभाश्रयाशुभा॥ १६२॥<br><br>स्त्रीणां हि परमं जन्म कुलानामुभयात्मनाम्।<br>इहामुत्र सुखायोक्तं सत्पतिप्राप्तिसंज्ञितम्॥ १६३॥<br><br>दुर्लभः सत्पतिः स्त्रीणां विगुणोऽपि पतिः किल।<br>न प्राप्यते विना पुण्यैः पतिर्नार्या कदाचन॥ १६४॥<br><br>यतो निःसाधनो धर्मः परिमाणोज्झिता रतिः।<br>धनं जीवितपर्याप्तं पत्यौ नार्याः प्रतिष्ठितम्॥ १६५॥ | है, मनमें ग्लानि हो रही है और कष्ट पा रहा हूँ। मुने! इस समय मुझपर अनुग्रह करके (कन्याके कष्ट-निवारक उपाय) यदि अयुक्त अथवा दुष्प्राप्य भी हो तो बतलाइये और मेरे कन्याविषयक दुःखको दूर कीजिये; क्योंकि निःसंदेहरूपसे कार्य-सिद्धिकी सम्भावना होनेपर भी फलके लोभमें आसक्त एवं कार्य-साधनमें निपुण अशुभ तृष्णा मेरे परिभवयुक्त मनको ठग रही है। स्त्रियोंके लिये उत्तम पतिकी प्राप्ति ही उनके सौभाग्यशाली जन्मकी सूचक है तथा वह पितृकुल एवं प्रतिकुल—दोनों कुलोंके लिये इहलोक और परलोकमें सुखका साधन बतलायी गयी है। इस प्रकार स्त्रियोंके लिये उत्तम पतिका मिलना तो दुर्लभ है ही, परंतु गुणहीन पति भी नारीको पुण्यके बिना कभी नहीं प्राप्त होता; क्योंकि नारीको साधनरहित धर्म, प्रचुर मात्रामें कामवासनाकी प्राप्ति और जीवन-निर्वाहके लिये धन पतिके द्वारा ही प्राप्त होते हैं॥ १५७—१६५॥ |
| निर्धनो दुर्भगो मूर्खः सर्वलक्षणवर्जितः।<br>दैवतं परमं नार्याः पतिरुक्तः सदैव हि॥ १६६॥<br><br>त्वया चोक्तं हि देवर्षे न जातोऽस्याः पतिः किल।<br>एतद्दौर्भाग्यमतुलमसंख्यं गुरु दुःसहम्॥ १६७॥<br><br>चराचरे भूतसर्गे यद्यद्यापि च नो मुने।<br>न संजात इति ब्रूषे तेन मे व्याकुलं मनः॥ १६८॥ | पति निर्धन, अभागा, मूर्ख और सभी शुभ लक्षणोंसे रहित क्यों न हो, किंतु वह नारीके लिये सदैव परम देवता कहा गया है। देवर्षे! आपने कहा है कि मेरी पुत्रीका पति पैदा ही नहीं हुआ है, यह तो इसका अतुलनीय एवं बहुत बड़ा दुःसह दुर्भाग्य है। मुने! आप जो ऐसा कह रहे हैं कि चराचर प्राणियोंकी सृष्टिमें वह अभीतक उत्पन्न ही नहीं हुआ है, इससे मेरा मन व्याकुल हो गया है। |
| मनुष्यदेवजातीनां शुभाशुभनिवेदकम्।<br>लक्षणं हस्तपादादौ विहितैर्लक्षणैः किल॥ १६९॥<br><br>सेयमुत्तानहस्तेति त्वयोक्ता मुनिपुङ्गव।<br>उत्तानहस्तता प्रोक्ता याचतामेव नित्यदा॥ १७०॥<br><br>शुभोदयानां धन्यानां न कदाचित्प्रयच्छताम्।<br>स्वच्छाययास्याश्चरणौ त्वयोक्तो व्यभिचारिणौ॥ १७१॥<br><br>तत्रापि श्रेयसी ह्याशा मुने न प्रतिभाति नः।<br>शरीरलक्षणाश्चान्ये पृथक् फलनिवेदिनः॥ १७२॥<br><br>सौभाग्यधनपुत्रायुःपतिलाभानुशंसनम् ।<br>तैश्च सर्वैर्विहीनेयं त्वमात्थ मुनिपुङ्गव॥ १७३॥ | मनुष्यों एवं देवजातियोंके शुभाशुभसूचक लक्षण हाथों एवं पैरोंमें चिह्नित लक्षणोंद्वारा जाने जाते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इस विषयमें भी आपने इसे उत्तानहस्ता बतलाया है। यह उत्तानहस्ता सदा याचकोंकी ही कही गयी है, किंतु जो सौभाग्यशाली, धन्यवादके पात्र और दानी होते हैं, उनके हाथ कभी उत्तान नहीं रहते। मुने! आपने यह भी कहा है कि इसके चरण अपनी छायासे युक्त होनेके कारण दोषी हैं, अतः इस विषयमें भी हमें कल्याणकारिणी आशा नहीं प्रतीत हो रही है। शरीरके अन्यान्य लक्षण पृथक्-पृथक् फल सूचित करते हैं। उनमें जो सौभाग्य, धन, पुत्र, आयु और पति-प्राप्तिके सूचक होते हैं, उन सभी लक्षणोंसे मेरी यह कन्या हीन है—ऐसा आप कह रहे हैं। |
| त्वं मे सर्वं विजानासि सत्यवागसि चाप्यतः।<br>मुह्यामि मुनिशार्दूल हृदयं दीर्यतीव मे॥ १७४॥ | मुनिश्रेष्ठ! आप मेरी सारी मनोगत अभिलाषाओंको जानते हैं। मुनिशार्दूल! आप सत्यवादी हैं, इसी कारण (आपकी बात सुनकर) मैं मोहित हो रहा हूँ और मेरा हृदय |