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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 623 of 1098

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Page 623

* अध्याय १५४ *
६१३

| श्रुत्वैतत् संभ्रमाविष्टो ध्वस्तधैर्यो महाचलः।<br>नारदं प्रत्युवाचाथ साश्रुकण्ठो महागिरिः॥ १४७ | यह सुनकर पर्वतराज हिमाचल व्याकुल हो गये। उनका सारा धैर्य जाता रहा। तब वे अश्रुगद्गद कण्ठसे नारदजीसे बोले॥ १४२—१४७॥ |
| हिमवानुवाच<br>संसारस्यातिदोषस्य दुर्विज्ञेया गतिर्यतः।<br>सृष्ट्यां चावश्यभाविन्यां केनाप्यतिशयात्मना॥ १४८<br>कर्त्रा प्रणीता मर्यादा स्थिता संसारिणामियम्।<br>यो जायते हि यद्बीजाज्जनेतुः स ह्यसार्थकः॥ १४९<br>जनिता चापि जातस्य न कश्चिदिति यत्स्फुटम्।<br>स्वकर्मणैव जायन्ते विविधा भूतजातयः॥ १५०<br>अण्डजो ह्यण्डजाज्जातः पुनर्जायेत मानवः।<br>मानुषाच्च सरीसृप्यां मनुष्यत्वेन जायते॥ १५१<br>तत्रापि जातौ श्रेष्ठायां धर्मस्योत्कर्षणेन तु।<br>अपुत्रजन्मिनः शेषाः प्राणिनः समवस्थिताः॥ १५२<br>मनुजास्तत्र जायन्ते यतो न गृहधर्मिणः।<br>क्रमेणाऽऽश्रमसम्प्राप्तिर्ब्रह्मचारिव्रतादनु ॥ १५३<br>तस्य कर्तुर्नियोगेन संसारो येन वर्धितः।<br>संसारस्य कुतो वृद्धिः सर्वे स्युर्यदतिग्रहाः॥ १५४<br>अतः कर्त्रा तु शास्त्रेषु सुतलाभः प्रशंसितः।<br>प्राणिनां मोहनाथार्य नरकत्राणसंश्रयात्॥ १५५<br>स्त्रिया विरहिता सृष्टिर्जन्तूनां नोपपद्यते।<br>स्त्रीजातिस्तु प्रकृत्यैव कृपणा दैन्यभाषिणी।<br>शास्त्रालोचनसामर्थ्यमुज्झितं तासु वेधसा॥ १५६ | हिमवान्ने कहा—देवर्षे! इस अत्यन्त दोषपूर्ण संसारकी गति दुर्विज्ञेय है। इस अवश्यम्भाविनी सृष्टिमें किसी कर्ता महापुरुषद्वारा जो मर्यादा स्थापित की गयी है, वह संसारी जीवोंके लिये स्थिर है। जो जिसके बीजसे उत्पन्न होता है, वह उस पैदा करनेवालेके लिये निरर्थक होता है, उसी प्रकार पैदा करनेवाला भी पैदा हुएका कोई नहीं है—यह तो स्पष्ट है; क्योंकि प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही उत्पन्न होती हैं। एक ही जीव अण्डजके सम्पर्कसे अण्डजयोनिमें पैदा होता है और वही पुनः मनुष्यके संयोगसे मानव-योनिमें उत्पन्न होता है। फिर मानव-योनिसे भी उलटकर सर्प आदि रेंगनेवाली योनियोंमें जन्म लेता है। वहाँ भी धर्मकी उत्कृष्टतासे उत्तम जातिमें जन्म होता है। शेष जो अधार्मिक प्राणी होते हैं, वे पुत्रहीन होते हैं। उनमें गृहस्थधर्मका सुचारुरूपसे पालन न करनेवाले मानवोंको पुत्रकी प्राप्ति नहीं होती। इन आश्रमोंकी प्राप्ति उसी कर्ताकी व्यवस्थासे, जिसने संसारकी वृद्धि की है, क्रमशः ब्रह्मचर्य व्रतके बाद होती है। यदि सभी प्राणी आश्रमधर्मका त्याग कर दें तो संसारकी वृद्धि कैसे हो सकती है। इसीलिये सृष्टिकर्ताने शास्त्रोंमें नरकसे त्राण करनेका लोभ दिखाकर प्राणियोंको मोहित करनेके लिये पुत्रप्राप्तिकी प्रशंसा की है; परंतु प्राणियोंकी सृष्टि स्त्रीके बिना हो नहीं सकती और वह स्त्री-जाति स्वभावसे ही दयनीय और दीनतापूर्वक बोलनेवाली होती है। इसीलिये ब्रह्माने उन स्त्रियोंको शास्त्रालोचनकी शक्ति नहीं दी है॥ १४८—१५६॥ |
| शास्त्रेषूक्तमसंदिग्धं बहुवारं महाफलम्।<br>दशपुत्रसमा कन्या या न स्याच्छीलवर्जिता॥ १५७<br>वाक्यमेतत् फलभ्रष्टं पुंसि ग्लानिकरं परम्।<br>कन्या हि कृपणा शोच्या पितुर्दुःखविवर्धिनी॥ १५८<br>यापि स्यात् पूर्णसर्वाढ्या पतिपुत्रधनादिभिः।<br>किं पुनर्दुर्भागा हीना पतिपुत्रधनादिभिः॥ १५९<br>त्वं चोक्तवान् सुताया मे शरीरे दोषसंग्रहम्।<br>अहो मुह्यामि शुष्यामि ग्लामि सीदामि नारद ॥ १६० | इसी प्रकार शास्त्रोंमें अनेकों बार निश्चितरूपसे इस महान् फलका वर्णन किया गया है कि जो कन्या शील-सदाचारसे रहित न हो, वह दस पुत्रोंके समान मानी गयी है; किंतु यह वाक्य निष्फल है और पुरुषके लिये अत्यन्त ग्लानि उत्पन्न करनेवाला है; क्योंकि जो कन्या पति, पुत्र, धन आदि सभी सुख-साधनोंसे पूर्ण सम्पन्न होनेपर भी जब कृपण, शोचनीय और पिताके दुःखको बढ़ानेवाली होती है, तब जो पति, पुत्र, धन आदिसे हीन अभागिनी हो तो उसके विषयमें क्या कहना है। नारदजी! आपने मेरी कन्याके शरीरमें तो दोष-समूहका ही वर्णन किया है, इसी कारण मैं मोहमें पड़ा हूँ, मेरा शरीर सूखा जा रहा |