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Read in context५८४ * मत्स्यपुराण *
| स तेन विद्धो व्यथितो बभूव दैत्येश्वरो विस्रुतशोणितौघः। <br> ततोऽस्य किंचिच्चलितस्य धैर्या- <br> दुवाच शङ्खाम्बुजशार्ङ्गपाणिः ॥ ३१ <br> कुमारिवध्योऽसि रणं विमुञ्च शुम्भासुर स्वल्पतरैरहोभिः। <br> वधं न मत्तोऽर्हसि चेह मूढ वृथैव किं युद्धसमुत्सुकोऽसि ॥ ३२ <br> जम्भो वचो विष्णुमुखान्निशम्य निमिश्च निष्पेष्टुमियेष विष्णुम्। <br> गदामथोद्यम्य निमिः प्रचण्डां जघान गाढं गरुडं शिरस्तः ॥ ३३ <br> शुम्भोऽपि विष्णुं परिघेण मूर्ध्नि प्रमृष्टरत्नौघविवित्रभासा। <br> तौ दानवाभ्यां विषमैः प्रहारै- <br> र्निपेतुरुर्व्यां घनपावकाभौ ॥ ३४ <br> तत्कर्म दृष्ट्वा दितिजास्तु सर्वे जगर्जुरुच्चैः कृतसिंहनादाः। <br> धनूंषि चास्फोट्य खुराभिघातै- <br> र्व्यदारयन्भूमिमपि प्रचण्डाः। <br> वासांसि चैवादुधुवुः परे तु दध्मुश्च शङ्खानकगोमुखौघान् ॥ ३५ <br> अथ संज्ञामवाप्याशु गरुडोऽपि सकेशवः। <br> पराङ्मुखो रणात्तस्मात्पलायत महाजवः ॥ ३६ | प्रकार विष्णुद्वारा बींधा गया दैत्येश्वर शुम्भ व्यथित हो उठा। उसके शरीरसे रक्तकी धाराएँ बहने लगीं। तत्पश्चात् जब वह कुछ धैर्य धारणकर उठ खड़ा हुआ, तब हाथमें शङ्ख, कमल और शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले विष्णुने उससे कहा—'शुम्भासुर! तुम थोड़े ही दिनोंमें किसी कुमारी कन्याके हाथों मारे जाओगे, अतः रणभूमिको छोड़कर हट जाओ। मूर्ख! इस युद्धमें तुम्हारा मेरे हाथों वध नहीं हो सकता, फिर व्यर्थ ही मेरे साथ युद्ध करनेके लिये क्यों समुत्सुक हो रहे हो?'॥ २७—३२॥ <br> तदनन्तर भगवान् विष्णुके मुखसे निकले हुए उस वचनको सुनकर जम्भ और निमि—दोनों दैत्य विष्णुको पीस डालनेके लिये आ पहुँचे। तब निमिने अपनी प्रचण्ड गुर्वीली गदाको उठाकर गरुड़के मस्तकपर प्रहार किया। उधर शुम्भने भी चमकीले रत्नसमूहोंकी विचित्र कान्तिसे सुशोभित परिघद्वारा विष्णुके मस्तकपर आघात किया। इस प्रकार उन दोनों दानवोंके भीषण प्रहारसे क्रमशः मेघ एवं अग्निकी-सी कान्तिवाले दोनों विष्णु और गरुड पृथ्वीपर गिर पड़े। उन दोनों दैत्योंके उस कर्मको देखकर सभी दैत्य सिंहनाद करते हुए उच्च स्वरसे गर्जना करने लगे। कुछ प्रचण्ड पराक्रमी दैत्य अपने धनुषोंको हिलाते हुए पैरोंके आघातसे पृथ्वीको भी विदीर्ण करने लगे। कुछ दैत्य हर्षमें भरकर अपने वस्त्रोंको हिलाने लगे तथा कुछ शङ्ख, नगाड़ा और गोमुख आदि बाजे बजाने लगे। तदनन्तर थोड़ी देर बाद केशवसहित गरुडकी भी चेतना लौट आयी। तब वे उस युद्धसे विमुख हो बड़े वेगसे भाग खड़े हुए॥ ३३—३६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे मथनादिसंग्रामो नाम द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें मथनादि-संग्राम नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५२॥
एक सौ तिरपनवाँ अध्याय
भगवान् विष्णु और इन्द्रका परस्पर उत्साहवर्धक वार्तालाप, देवताओंद्वारा पुनः सैन्य-संगठन, इन्द्रका असुरोंके साथ भीषण युद्ध, गजासुर और जम्भासुरकी मृत्यु, तारकासुरका घोर संग्राम और उसके द्वारा भगवान् विष्णुसहित देवताओंका बंदी बनाया जाना
| सूत उवाच <br> तमालोक्य पलायन्तं विभ्रष्टध्वजकार्मुकम्। <br> हरिं देवः सहस्राक्षो मेने भग्नं दुराहवे॥ १ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! उस भयंकर युद्धमें उन श्रीहरिको ध्वज और धनुषसे रहित हो भागते हुए देखकर सहस्र नेत्रधारी देवराज इन्द्रने उन्हें पराजित हुआ मान लिया। |