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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 593 of 1098

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Page 593
  • अध्याय १५२ *

५८३

अथाच्युतोऽपि विज्ञाय दानवस्य चिकीर्षितम्।<br>वदनं पूरयामास दिव्यैरस्त्रैर्महाबलः॥ २०<br>महिषस्याथ ससृजे बाणौघं गरुडध्वजः।<br>पिधाय वदनं दिव्यैर्दिव्यास्त्रपरिमन्त्रितैः॥ २१<br>स तैर्बाणैरभिहतो महिषोऽचलसंनिभः।<br>परिवर्तितकायोऽधः पपात न ममार च॥ २२<br>महिषं पतितं दृष्ट्वा भूमौ प्रोवाच केशवः।<br>महिषासुर मत्तस्त्वं वधं नास्त्रैरिहार्हसि॥ २३<br>योषिद्वध्यः पुरोक्तोऽसि साक्षात्कमलयोनिना।<br>उत्तिष्ठ जीवितं रक्ष गच्छास्मात्सङ्गराद् द्रुतम्॥ २४<br>तस्मिन् पराङ्मुखे दैत्ये महिषे शुम्भदानवः।<br>संदष्टौष्ठपुटः कोपाद् भुकुटीकुटिलाननः॥ २५<br>निर्मथ्य पाणिना पाणिं धनुरदाय भैरवम्।<br>सज्यं चकार स धनुः शरांश्चाशीविषोपमान्॥ २६<br>स चित्रयोधी दृढमुष्टिपात-<br>स्ततस्तु विष्णुं गरुडं च दैत्यः।<br>बाणैर्ज्वलद्वहिशिखानिकाशैः<br>क्षिप्तैरसंख्यैः परिघातहीनौः॥ २७<br>विष्णुश्च दैत्येन्द्रशराहतोऽपि<br>भुशुण्डिमादाय कृतान्ततुल्याम्।<br>तया भुशुण्ड्या च पिपेष मेषं<br>शुम्भस्य पत्रं धरणीधराभम्॥ २८<br>तस्मादवप्लुत्य हताच्च मेषाद्<br>भूमौ पदातिः स तु दैत्यनाथः।<br>ततो महीस्थस्य हरिः शरौघान्<br>मुमोच कालानलतुल्यभासः॥ २९<br>शरैस्त्रिभिस्तस्य भुजं बिभेद<br>षड्भिश्च शीर्षं दशभिश्च केतुम्।<br>विष्णुर्विकृष्टैः श्रवणावसानं<br>दैत्यस्य विव्याध विवृत्तनेत्रः॥ ३०तदनन्तर जब महाबली विष्णुको उस दानवकी चेष्टा ज्ञात हुई, तब उन्होंने दिव्यास्त्रोंसे उसके मुखको भर दिया। इस प्रकार भगवान् गरुडध्वजने दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित दिव्य बाणोंद्वारा महिषासुरके मुखको ढककर उसपर बाणसमूहोंकी वृष्टि करने लगे। उन बाणोंसे आहत हुए पर्वत-सदृश विशालकाय महिषासुरका शरीर विकृत हो गया और वह रथसे नीचे गिर पड़ा, परंतु मृत्युको नहीं प्राप्त हुआ। महिषको भूमिपर पड़ा हुआ देखकर केशवने कहा—'महिषासुर! इस युद्धमें तुम मेरे अस्त्रोंद्वारा मृत्युको नहीं प्राप्त हो सकते; क्योंकि कमलयोनि साक्षात् ब्रह्मा ने तुमसे पहले कह ही दिया है कि तुम्हारी मृत्यु किसी स्त्रीके हाथसे होगी। अतः उठो, अपने जीवनकी रक्षा करो और शीघ्र ही इस युद्धस्थलसे दूर हट जाओ।' इस प्रकार उस दैत्यराज महिषके युद्धविमुख हो जानेपर शुम्भ नामक दानव कुपित हो उठा। उसकी भौंहें तन गयीं और मुख विकराल हो गया। वह दाँतोंसे होंठको चबाता हुआ हाथ-से-हाथ मलने लगा। तत्पश्चात् उसने अपने भयंकर धनुषको हाथमें लेकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी तथा सर्पके समान जहरीले बाणोंको हाथमें लिया॥ २०—२६॥<br><br>फिर तो सुदृढ़ मुष्टिसे युक्त एवं विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले उस दैत्यने धधकती हुई अग्निकी लपटोंके समान विकराल एवं अचूक लक्ष्यवाले असंख्य बाणोंके प्रहारसे विष्णु और गरुडको घायल कर दिया। तब दैत्येन्द्र शुम्भके बाणोंसे आहत हुए विष्णुने भी कृतान्तके समान भुशुण्डि हाथमें ली और उस भुशुण्डिसे शुम्भके वाहन पर्वतके समान विशालकाय मेषको पीसकर चूर्ण कर दिया। तब वह दैत्यराज मरे हुए मेषसे कूदकर पृथ्वीपर आ गया और पैदल ही युद्ध करने लगा। इस प्रकार पृथ्वीपर खड़े हुए उस दानवपर श्रीहरि प्रलयकालीन अग्निके तुल्य चमकीले बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे। उस समय (उस दैत्यकी ओर) आँख फाड़कर देखते हुए विष्णुने प्रत्यञ्चाको कानतक खींचकर छोड़े गये तीन बाणोंसे उस दैत्यकी भुजाको, छः बाणोंसे मस्तकको और दस बाणोंसे ध्वजको विदीर्ण कर दिया। इस