मत्स्य महापुराण

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| * अध्याय १५० * | ५७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विस्फूर्जत्करसम्पातसमाक्रान्तजगत्त्रयम् ।<br>तताप दानवानीकं गतमज्जौघशोणितम् ॥ १६९<br><br>ततश्चावर्षदनलं समन्तादतिसंहतम् ।<br>चक्षूंषि दानवेन्द्राणां चकारान्धानि च प्रभुः ॥ १७०<br><br>गजानामगलन्मेदः पेतुश्चाप्युरवा भुवि ।<br>तुरगा निःश्वसन्तश्च घर्मार्ता रथिनोऽपि च ॥ १७१<br><br>इतश्चेतश्च सलिलं प्रार्थयन्तस्तृषातुराः ।<br>प्रच्छायविटपांश्चैव गिरीणां गह्वराणि च ॥ १७२<br><br>दावाग्निः प्रज्वलँश्चैव घोरार्चिर्दग्धपादपः ।<br>तोयार्थिनः पुरो दृष्ट्वा तोयं कल्लोलमालिनम् ॥ १७३<br><br>पुरःस्थितमपि प्राप्तं न शेकुरवमर्दिताः ।<br>अप्राप्य सलिलं भूमौ व्यात्तास्या गतचेतसः ॥ १७४<br><br>तत्र तत्र व्यदृश्यन्त मृता दैत्येश्वरा भुवि ।<br>रथा गजाश्च पतितास्तुरगाश्च समापिताः ॥ १७५<br><br>स्थिता वमन्तो धावन्तो गलद्रक्तवसासृजः ।<br>दानवानां सहस्राणि व्यदृश्यन्त मृतानि तु ॥ १७६<br><br>संक्षये दानवेन्द्राणां तस्मिन् महति वर्तिते ।<br>प्रकोपोद्भूतताम्राक्षः कालनेमी रुषातुरः ॥ १७७<br><br>अभवत् कल्पमेघाभः स्फुरद्भूरिशतह्रदः ।<br>गम्भीरास्फोटनिर्ह्रादजगद्धृदयघट्टकः ॥ १७८<br><br>प्रच्छाद्य गगनाभोगं रविमायां व्यनाशयत् ।<br>शीतं ववर्ष सलिलं दानवेन्द्रबलं प्रति ॥ १७९<br><br>दैत्यास्तां वृष्टिमासाद्य समाश्वस्तास्ततः क्रमात् ।<br>बीजाङ्कुरा इवाम्लानाः प्राप्य वृष्टिं धरातले ॥ १८० | उन रूपोंसे निकलती हुई किरणोंके गिरनेसे तीनों लोक आक्रान्त हो गये। उससे मज्जा और रक्तसे रहित दानवोंकी सेना संतप्त हो उठी। तत्पश्चात् सामर्थ्यशाली सूर्यदेवने चारों ओर अग्निकी अत्यन्त घोर वृष्टि की और दानवेन्द्रोंके नेत्रोंको अंधा कर दिया। हाथियोंकी मज्जाएँ गल गयीं और वे चुपचाप धराशायी हो गये। धूपसे पीड़ित हुए घोड़े लम्बी साँस खींचने लगे। प्याससे व्याकुल हुए रथी भी इधर-उधर पानीकी खोज करते हुए छायादार वृक्षों और पर्वतोंकी गुफाओंकी शरण लेने लगे। उस समय दावाग्नि प्रज्वलित हो उठी, जिसकी भयंकर ज्वालाने वृक्षोंको जलाकर भस्म कर दिया। जलाभिलाषी लोग सामने ही हिलोरें लेते हुए जलसे भरे हुए जलाशयको देखकर सामने स्थित रहनेपर भी दावाग्निसे पीड़ित होनेके कारण प्राप्त नहीं कर सकते थे, अतः जल न पाकर मुख फैलाये हुए भूतलपर गिरकर चेतनारहित हो जाते थे। भूतलपर जगह-जगह मरे हुए दैत्येश्वर दिखायी पड़ते थे। कहीं-कहीं टूटे हुए रथ तथा मरे हुए हाथी और घोड़े पड़े हुए थे। कहीं कुछ लोग बैठकर रक्त उगल रहे थे और कुछ दौड़ लगा रहे थे, जिनके शरीरसे रक्त, मज्जा और चर्बी टपक रही थी। कहीं हजारोंकी संख्यामें मरे हुए दानव दीख रहे थे। दानवेन्द्रोंके उस महान् विनाशके उपस्थित होनेपर कालनेमि क्रोधसे विह्वल हो उठा। प्रचण्ड क्रोधके कारण उसके नेत्र लाल हो गये। उसकी शरीरकान्ति प्रलयकालीन मेघके समान हो गयी। वह उमड़ते हुए सैकड़ों जलाशयोंके सदृश उछल पड़ा और गम्भीररूपसे ताल ठोंककर एवं सिंहनाद करके जगत्के प्राणियोंके हृदयोंको कम्पित कर दिया। फिर उसने आकाशमण्डलको आच्छादित कर सूर्यकी मायाको नष्ट कर दिया। तदनन्तर दानवेन्द्रकी सेनापर शीतल जलकी वर्षा होने लगी। दैत्यगण उस वृष्टिका अनुभव कर क्रमशः उसी प्रकार समाश्वस्त हो गये, जैसे भूतलपर सूखते हुए बीजाङ्कुर जलकी वृष्टिसे हरे-भरे हो जाते हैं॥ १६९-१८० ॥ |
| ततः स मेघरूपी तु कालनेमिर्महासुरः ।<br>शस्त्रवृष्टिं ववर्षोग्रां देवानीकेषु दुर्जयः ॥ १८१<br><br>तया वृष्ट्या बाध्यमाना दैत्येन्द्राणां महौजसाम् ।<br>गतिं कांचन पश्यन्तो गावः शीतार्दिता इव ॥ १८२ | तत्पश्चात् दुर्जय एवं महान् असुर कालनेमि मेघरूप होकर देवताओंकी सेनाओंपर भीषण शस्त्रवृष्टि करने लगा। प्रचण्ड पराक्रमी दैत्येन्द्रोंकी उस बाणवर्षासे पीड़ित हुए देवगणोंको शीतसे पीड़ित गौओंकी तरह कोई आश्रयस्थान नहीं दीख रहा था। |