मत्स्य महापुराण

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५७२ * मत्स्यपुराण *
| प्रयत्नविधृतैरश्वैः सितचामरमालिभिः।<br>जगद्दीपोऽथ भगवान् जग्राह विततं धनुः॥ १५४<br>शरौ च द्वौ महाभागो दिव्यावाशीविषद्युती।<br>संचारास्त्रेण संधाय बाणमेकं ससर्ज सः॥ १५५<br>द्वितीयमिन्द्रजालेन योजितं प्रमुमोच ह।<br>संचारास्त्रेण रूपाणां क्षणाच्चक्रे विपर्ययम्॥ १५६<br>देवानां दानवं रूपं दानवानां च दैविकम्।<br>मत्वासुरान् स्वकानेव जघ्ने घोरास्त्रलाघवात्॥ १५७<br>कालनेमी रुषाविष्टः कृतान्त इव संक्षये।<br>कांश्चित् खड्गेन तीक्ष्णेन कांश्चिन्नाराचवृष्टिभिः॥ १५८<br>कांश्चिद्गदाभिर्घोराभिः कांश्चिद् घोरैः परश्वधैः॥ १५९<br>शिरांसि केषांचिदपातयच्च<br>भुजान् रथान् सारथींश्चोग्रवेगः।<br>कांश्चित्पिपेषाथ रथस्य वेगात्<br>कांश्चित् क्रुधा चोद्धतमुष्टिपातैः॥ १६० | अरुणने श्वेत कलंगियोंसे विभूषित एवं प्रयत्नपूर्वक वशमें किये गये अश्वोंसे जुते हुए रथको आगे बढ़ाया। तत्पश्चात् जगत्को उद्भासित करनेवाले महाभाग भगवान् सूर्यने अपना विशाल धनुष तथा सर्पकी-सी कान्तिवाले दो दिव्य बाणोंको हाथमें लिया। उनमेंसे एक बाणको संचारास्त्रसे संयुक्त करके चलाया तथा दूसरेको इन्द्रजालसे युक्त करके छोड़ दिया। संचारास्त्रके प्रयोगसे क्षणमात्रमें ही लोगोंके रूपोंका परिवर्तन हो गया। देवता दानवोंके और दानव देवताओंके रूपमें बदल गये। फिर तो दानव देवताओंको आत्मीय मानकर दैत्योंपर ही फुर्तीसे प्रहार करने लगे। प्रलयकालमें कृतान्तके समान क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि किन्हींको तीखी तलवारसे, किन्हींको बाणोंकी वृष्टिसे, किन्हींको भयंकर गदाओंसे और किन्हींको भीषण कुठारोंसे मार गिराया तथा किन्हींके मस्तकों, भुजाओं और सारथिसहित रथोंको धराशायी कर दिया। उस प्रचण्ड वेगशाली दैत्यने किन्हींको रथके वेगपूर्वक धक्केसे पीस दिया तथा किन्हींको क्रोधपूर्वक कठोर मुक्केके प्रहारसे यमलोकका पथिक बना दिया॥ १५२—१६०॥ |
| रणे विनिहतान् दृष्ट्वा नेमिः स्वान् दानवाधिपः।<br>रूपं स्वं तु प्रपद्यन्त ह्यसुराः सुरधर्षिताः॥ १६१<br>कालनेमी रुषाविष्टस्तेषां रूपं न बुद्धवान्।<br>नेमिदैत्यस्तु तान् दृष्ट्वा कालनेमिमुवाच ह॥ १६२<br>अहं नेमिः सुरो नैव कालनेमे विदस्व माम्।<br>भवता मोहितेनाजौ निहता भूरिविक्रमाः॥ १६३<br>दैत्यानां दशलक्षाणि दुर्जयानां सुरैरिह।<br>सर्वास्त्रनिवारणं मुञ्च ब्राह्मास्त्रं त्वरान्वितः॥ १६४<br>स तेन बोधितो दैत्यः सम्भ्रमाकुलचेतनः।<br>योजयामास बाणं हि ब्रह्मास्त्रविहितेन तु॥ १६५<br>मुमोच चापि दैत्येन्द्रः स स्वयं सुरकण्टकः।<br>ततोऽस्त्रतेजसा व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ १६६<br>देवानां चाभवत् सैन्यं सर्वमेव भयान्वितम्।<br>संचारास्त्रं च संशान्तं स्वयमायोधने बभौ॥ १६७<br>तस्मिन् प्रतिहते ह्यस्त्रे भ्रष्टतेजा दिवाकरः।<br>महेन्द्रजालमाश्रित्य चक्रे स्वां कोटिशस्तनुम्॥ १६८ | उस समय देवताओंसे पराजित हुए बहुत-से दैत्योंको अपने रूपकी प्राप्ति हो चुकी थी, परंतु क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि उनके रूपको नहीं जानता था। इस प्रकार रणभूमिमें अपने पक्षके उन दैत्योंको मारा गया देखकर दानवराज नेमि दैत्यने कालनेमिसे कहा—‘कालनेमि! मैं नेमि नामक असुर हूँ, देवता नहीं हूँ। तुम मुझे पहचानो। मायासे मोहित होनेके कारण तुमने युद्धस्थलमें बहुत-से प्रचण्ड पराक्रमी दैत्योंका सफाया कर दिया है। देवताओंने इस युद्धमें दस लाख दुर्जय दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया है। इसलिये अब तुम शीघ्रतापूर्वक सभी अस्त्रोंके निवारण करनेवाले ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करो।’ इस प्रकार नेमिद्वारा समझाये जानेपर दैत्यराज कालनेमिका चित्त सम्भ्रमके कारण व्याकुल हो गया, तब उसने बाणको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके धनुषपर संधान किया तथा उस सुरकण्टक दैत्येन्द्रने स्वयं उसे छोड़ भी दिया। फिर तो उस अस्त्रके तेजसे चराचरसहित त्रिलोकी व्याप्त हो गयी। देवताओंकी सारी सेना भयभीत हो गयी तथा युद्धभूमिमें संचारास्त्र स्वयं शान्त हो गया। उस अस्त्रके विफल हो जानेपर सूर्यका तेज नष्ट हो गया, तब उन्होंने महेन्द्रजालका आश्रय लेकर अपने शरीरको करोड़ों रूपोंमें प्रकट किया॥ १६१—१६८॥ |