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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 564 of 1098

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Page 564
५५४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मेघस्य द्वीपिभिर्भीमैः कुञ्जरैः कालनेमिनः।<br>पर्वताभैः समारूढो निर्मिर्मतैर्महागजैः॥ ५१<br><br>चतुर्दन्तैर्गन्धवद्भिः शिक्षितैर्मेघभैरवैः।<br>शतहस्तायतैः कृष्णैः तुरङ्गैर्हेमभूषणैः॥ ५२<br><br>सितचामरजालेन शोभिते दक्षिणां दिशम्।<br>सितचन्दनचार्वाङ्गो नानापुष्पस्रजोज्ज्वलः॥ ५३<br><br>मथनो नाम दैत्येन्द्रः पाशहस्तो व्यराजत।<br>जम्भकः किङ्किणीजालमालमुष्ट्रं समास्थितः॥ ५४<br><br>कालशुक्लमहामेषमारूढः शुम्भदानवः।<br>अन्येऽपि दानवा वीरा नानावाहनगामिनः॥ ५५चीतों और कालनेमिका भयंकर हाथियोंसे संयुक्त था। दैत्यनायक निमि एक ऐसे रथपर सवार था जिसमें मतवाले गजराज जुते हुए थे, जो पर्वतके समान विशालकाय और चार दाँतोंसे युक्त थे, जिनके गण्डस्थलोंसे मदकी धारा बह रही थी, जो मेघ-सदृश भयंकर गर्जना करनेवाले और युद्धकलामें शिक्षित थे। जिसके शरीरमें श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा था और जो अनेकों प्रकारके उज्ज्वल पुष्पोंकी मालाओंसे सुशोभित था, वह मथन नामक दैत्येन्द्र हाथमें पाश लिये हुए उस सैन्यसमूहकी दक्षिण दिशामें स्थित श्वेत चामरोंसे विभूषित रथपर शोभा पा रहा था। उसके रथमें सौ हाथ लम्बे शरीरवाले स्वर्णाभरणोंसे विभूषित काले रंगके घोड़े जुते हुए थे। जम्भक क्षुद्र घंटिकाओंसे सुशोभित ऊँटपर सवार था। शुम्भ नामक दानव कालके समान भयंकर एवं श्वेत वर्णवाले एक विशालकाय मेषपर आरूढ था। दूसरे भी दानववीर नाना प्रकारके वाहनोंपर चढ़कर चल रहे थे॥ ४८—५५॥
प्रचण्डचित्रकर्माणः कुण्डलोष्णीषभूषणाः।<br>नानाविधोत्तरासङ्गा नानामाल्यविभूषणाः॥ ५६<br><br>नानासुगन्धिगन्धाढ्या नानाबन्दिजनस्तुताः।<br>नानावाद्यपरिस्पन्दाश्चाग्रेसरमहारथाः ॥ ५७<br><br>नानाशौर्य कथासक्तास्तस्मिन् सैन्ये महासुराः।<br>तद्बलं दैत्यसिंहस्य भीमरूपं व्यजायत॥ ५८<br><br>प्रमत्तचण्डमातङ्गतुरङ्ग रथसङ्कुलम्।<br>प्रतस्थेऽमरयुद्धाय बहुपत्तिपताकिनम्॥ ५९वे सभी दैत्य अद्भुत पराक्रमपूर्ण कर्म करनेवाले, कुण्डल और पगड़ीसे विभूषित, अनेक प्रकारके दुपट्टोंसे सुशोभित, नाना प्रकारकी मालाओंसे सुसज्जित और अनेकविध सुगन्धित पदार्थोंसे सुवासित थे। उनके आगे-आगे वंदीगण स्तुति-गान कर रहे थे। उनके साथ अनेकों प्रकारके युद्धके बाजे बज रहे थे। और वे सभी अग्रेसर महारथी अनेकविध शृङ्गारसे सुसज्जित थे। उस सेनामें प्रधान-प्रधान असुर पराक्रमपूर्ण कथाओंके कहने-सुननेमें आसक्त थे। दैत्यसिंह तारकासुरकी वह सेना मतवाले एवं पराक्रमी हाथियों, घोड़ों और रथोंसे व्याप्त होनेके कारण अत्यन्त भयंकर दीख रही थी। उसमें ध्वजाएँ फहरा रही थीं और बहुत-से पैदल सैनिक भी थे। इस प्रकार वह सेना देवताओंसे टक्कर लेनेके लिये प्रस्थित हुई।
एतस्मिन्नन्तरे वायुर्देवदूतोऽम्बरालये।<br>दृष्ट्वा स दानवबलं जगामेन्द्रस्य शंसितुम्॥ ६०<br><br>स गत्वा तु सभां दिव्यां महेन्द्रस्य महात्मनः।<br>शशंस मध्ये देवानां तत्कार्यं समुपस्थितम्॥ ६१इसी अवसरपर देवदूत वायु दानवोंकी उस सेनाको प्रस्थित होते हुए देखकर इन्द्रको सूचित करनेके लिये स्वर्गलोकमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने महात्मा महेन्द्रकी दिव्य सभामें जाकर देवताओंके बीच उस उपस्थित हुए कार्यकी सूचना दी।