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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 563 of 1098

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Page 563
* अध्याय १४८ *५५३
मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
आहत्य भेरीं गम्भीरां दैत्यानाहूय सत्वरः।<br>तुरगाणां सहस्रेण चक्राष्टकविभूषितम्॥ ३९<br><br>शुक्लाम्बरपरिष्कारं चतुर्योजनविस्तृतम्।<br>नानाक्रीडागृहयुतं गीतवाद्यमनोहरम्॥ ४०<br><br>विमानमिव देवस्य सुरभर्तुः शतक्रतोः।<br>दशकोटीश्वरा दैत्या दैत्यास्ते चण्डविक्रमाः॥ ४१<br><br>तेषामग्रेसरो जम्भः कुजम्भोऽन्तरस्ततः।<br>महिषः कुञ्जरो मेघः कालनेमिर्निमिस्तथा॥ ४२<br><br>मथनो जम्भकः शुम्भो दैत्येन्द्रा दश नायकाः।<br>अन्येऽपि शतशस्तस्य पृथिवीदलनक्षमाः॥ ४३<br><br>दैत्येन्द्रा गिरिवर्ष्माणः सन्ति चण्डपराक्रमाः।<br>नानायुधप्रहरणा नानाशास्त्रास्त्रपारगाः॥ ४४<br><br>तारकस्याभवत् केतू रौद्रः कनकभूषणः।<br>केतुना मकरेणापि सेनानीर्ग्रसनोऽरिहा॥ ४५<br><br>पैशाचं यस्य वदनं जम्भस्यासीदयोमयम्।<br>खरं विधूतलाङ्गूलं कुजम्भस्याभवद्ध्वजे॥ ४६<br><br>महिषस्य तु गोमायुं केतोर्हैमं तदाभवत्।<br>ध्वाङ्क्षं ध्वजे तु शुम्भस्य कृष्णायोमयमुच्छ्रितम्॥ ४७कार्य करना आरम्भ किया। उसने तुरंत ही गम्भीर शब्द करनेवाली भेरी बजाकर दैत्योंको बुलाया। फिर आठ पहियोंसे विभूषित रथमें एक हजार घोड़े जोत दिये गये। (वह उसपर सवार हुआ।) वह रथ चार योजन विस्तारवाला और अनेकों क्रीडागृहोंसे युक्त था। उसपर श्वेत वस्त्रका आच्छादन पड़ा हुआ था तथा वह गीतों और वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे मनोहर लग रहा था। उस समय वह ऐसा दीख रहा था, मानो देवराज इन्द्रदेवका विमान हो। उस समय दस करोड़ दैत्याधिपति उपस्थित थे, वे सभी दैत्य प्रचण्ड पराक्रमी थे। उनका अगुआ जम्भ था। इसके बाद कुजम्भ, महिष, कुंजर, मेघ, कालनेमि, निमि, मथन, जम्भक और शुम्भ नामक दस दैत्येन्द्र सेनानायक थे। इनके अतिरिक्त अन्य भी सैकड़ों दैत्य थे जो पृथ्वीका मर्दन करनेमें समर्थ थे। ये सभी दैत्येन्द्र पर्वतके समान विशाल शरीरवाले, प्रचण्ड पराक्रमी, नाना प्रकारके आयुधोंका प्रयोग करनेमें निपुण और अनेकविध शस्त्रास्त्रोंकी प्रयोगविधिमें पारंगत थे। तारकासुरका स्वर्णभूषित ध्वज अत्यन्त भयंकर था। शत्रु का विनाश करनेवाले सेनापति ग्रसनका ध्वज मकरके आकारसे युक्त था। जम्भका ध्वज लौहनिर्मित था और उसपर पिशाचके मुखका चिह्न बना हुआ था। कुजम्भके ध्वजपर हिलती हुई पूँछवाला गधा अङ्कित था। महिषके ध्वजपर स्वर्णनिर्मित शृगालका चित्र था। शुम्भका ध्वज काले लोहेका बना हुआ अत्यन्त ऊँचा था और उसपर फौलादका बना काकका आकार चित्रित था॥ ३८—४७॥
अनेकाकारविन्यासाश्चान्येषां तु ध्वजास्तथा।<br>शतेन शीघ्रवेगाणां व्याघ्राणां हेममालिनाम्॥ ४८<br><br>ग्रसनस्य रथो युक्तो किङ्किणीजालमालिनाम्।<br>शतेनापि च सिंहानां रथो जम्भस्य दुर्जयः॥ ४९<br><br>कुजम्भस्य रथो युक्तः पिशाचवदनैः खरैः।<br>रथस्तु महिषस्योष्ट्रैर्गजस्य तु तुरङ्गमैः॥ ५०इसी प्रकार अन्य दैत्योंके ध्वजोंपर भी अनेकों प्रकारके आकारका विन्यास किया गया था। ग्रसनके रथमें सौ शीघ्रगामी व्याघ्र जुते हुए थे, जिनके गलेमें सोनेकी मालाएँ पड़ी थीं और जो क्षुद्रघंटिकाओंसे सुशोभित थे। जम्भका दुर्जय रथ भी सौ सिंहोंद्वारा खींचा जा रहा था। कुजम्भका रथ पिशाच-सदृश मुखवाले गधोंसे युक्त था। महिषका रथ ऊँटों, कुंजरका घोड़ों, मेघका