मत्स्य महापुराण

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- अध्याय १४६ *
५४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऊर्ध्वबाहुः स दैत्येन्द्रोऽचरद्वब्दसहस्रकम्।<br>कालं कमलपत्राक्षः शुद्धबुद्धिर्महातपाः॥ ५९<br><br>तावच्चावाङ्मुखः कालं तावत्पञ्चाग्निमध्यगः।<br>निराहारो घोरतपास्तपोराशिरजायत॥ ६०<br><br>ततः सोऽन्तर्जले चक्रे कालं वर्षसहस्रकम्।<br>जलान्तरं प्रविष्टस्य तस्य पत्नी महाव्रता॥ ६१<br><br>तस्यैव तीरे सरसस्तप्स्यन्ती मौनमास्थिता।<br>निराहारा तपो घोरं प्रविवेश महाद्युतिः॥ ६२<br><br>तस्यां तपसि वर्तन्यामिन्द्रश्चक्रे विभीषिकाम्।<br>भूत्वा तु मर्कटस्तत्र तदाश्रमपदं महान्॥ ६३<br><br>चक्रे विलोलं निःशेषं तुम्बीघटकरण्डकम्।<br>ततस्तु मेषरूपेण कम्पं तस्याकरोन्महान्॥ ६४<br><br>ततो भुजङ्गरूपेण बध्वा च चरणद्वयम्।<br>अपाकर्षत् ततो दूरं भ्रमंस्तस्या महीमिमाम्॥ ६५<br><br>तपोबलाढ्या सा तस्य न वध्यत्वं जगाम ह।<br>ततो गोमायुरूपेण तस्यादूषयदाश्रमम्॥ ६६<br><br>ततस्तु मेघरूपेण तस्याः क्लेदयदाश्रमम्।<br>भीषिकाभिरनेकाभिस्तां क्लिश्नन् पाकशासनः॥ ६७<br><br>विरराम यदा नैवं वज्राङ्गमहिषी तदा।<br>शैलस्य दुष्टतां मत्वा शापं दातुं व्यवस्थिता॥ ६८<br><br>स शापाभिमुखां दृष्ट्वा शैलः पुरुषविग्रहः।<br>उवाच तां वरारोहां वराङ्गीं भीरुचेतनः॥ ६९<br><br>नाहं वराङ्गने दुष्टः सेव्योऽहं सर्वदेहिनाम्।<br>विभ्रमं तु करोत्येष रुषितः पाकशासनः॥ ७० | चला गया। वहाँ महातपस्वी दैत्यराज वज्राङ्ग, जिसके नेत्र कमलदलके समान थे तथा जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गयी थी, एक हजार वर्षतक दोनों हाथ ऊपर उठाकर तपस्या करता रहा। पुनः उसने एक हजार वर्षतक नीचे मुख किये हुए तथा एक हजार वर्षतक पञ्चाग्निके बीचमें बैठकर घोर तपस्या की। उस समय उसने भोजनका परित्याग कर दिया था। इस प्रकार वह तपस्याकी राशि-जैसा हो गया था। तत्पश्चात् उसने एक हजार वर्षतक जलके भीतर बैठकर तप किया। जिस समय वह जलके भीतर प्रविष्ट होकर तप कर रहा था, उसी समय उसकी अत्यन्त सुन्दरी एवं महाव्रतपरायणा पत्नी वराङ्गी भी उसी सरोवरके तटपर मौन धारणकर तपस्या करती हुई घोर तपमें संलग्न हो गयी। उस समय वह निराहार ही रहती थी। उसके तपस्या करते समय (उसे तपसे डिगानेके निमित्त) इन्द्र तरह-तरहकी विभीषिकाएँ उत्पन्न करने लगे॥ ५६—६२ १/२ ॥<br><br>वे बन्दरका विशाल रूप धारणकर उसके आश्रमपर पहुँचे और वहाँकि सम्पूर्ण तुंबी, घट और पिटारी आदिको तितर-बितर कर दिया। फिर मेषरूपसे उसे भलीभाँति कँपाया। तत्पश्चात् सर्पका रूप बनाकर उसके दोनों चरणोंको अपने शरीरसे बाँधकर इस पृथ्वीपर घूमते हुए उसे दूरतक घसीटते रहे, किंतु वराङ्गी तपोबलसे सम्पन्न थीं, अतः इन्द्रद्वारा मारी न जा सकीं। तब इन्द्रने शृगालका रूप धारणकर उसके आश्रमको दूषित कर दिया। फिर उन्होंने बादल बनकर उसके आश्रमको भिगो दिया। इस प्रकार इन्द्र अनेकों प्रकारकी विभीषिकाओंको दिखाकर उसे कष्ट पहुँचाते रहे। जब इन्द्र इस प्रकारके कुकर्मसे विरत नहीं हुए, तब वज्राङ्गकी पटरानी वराङ्गी इसे पर्वतकी दुष्टता मानकर उसे शाप देनेके लिये उद्यत हो गयी। इस प्रकार उसे शाप देनेके लिये उद्यत देखकर पर्वतका हृदय भयभीत हो गया। तब उसने पुरुषका शरीर धारणकर उस सुन्दरी वराङ्गीसे कहा—'वराङ्गने ! मैं दुष्ट नहीं हूँ। मैं तो सभी देहधारियोंके लिये सेवनीय हूँ। यह सब उपद्रव तो ये क्रुद्ध हुए इन्द्र कर रहे हैं।' इसी बीच (जलके भीतर बैठकर तपस्या करते हुए वज्राङ्गका) |