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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 554 of 1098

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Page 554

५४४ * मत्स्यपुराण *

बद्ध्वा ततः सहस्राक्षं पाशेनामोघवर्चसा।<br>मातुरन्तिकमागच्छद्व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा॥ ४७<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा कश्यपश्च महातपाः।<br>आगतौ तत्र यत्रास्तां मातापुत्रावभीतवौ॥ ४८वहाँ उसने अपने अमोघवर्चस्वी पाशसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्रको बाँधकर माताके निकट लाकर उसी प्रकार खड़ा कर दिया, जैसे व्याघ्र छोटे-से मृगको पकड़ लेता है। इसी बीच ब्रह्मा और महातपस्वी महर्षि कश्यप—ये दोनों वहाँ आ पहुँचे, जहाँ वे दोनों माता-पुत्र निर्भय हुए स्थित थे॥ ३६–४८॥
दृष्ट्वा तु तमुवाचेदं ब्रह्मा कश्यप एव च।<br>मुञ्चैनं पुत्र देवेन्द्रं किमनेन प्रयोजनम्॥ ४९<br>अपमानो वधः प्रोक्तः पुत्र सम्भावितस्य च।<br>अस्मद्वाक्येन यो मुक्तो विद्धि तं मृतमेव च॥ ५०<br>परस्य गौरवन्मुक्तः शत्रूणां भारमावहेत्।<br>जीवन्नेव मृतो वत्स दिवसे दिवसे स तु॥ ५१<br>महतां वशमायाते वैरं नैवास्ति वैरिणि।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वज्राङ्गः प्रणतो वाक्यमब्रवीत्॥ ५२<br>न मे कृत्यमनेनास्ति मातुराज्ञा कृता मया।<br>त्वं सुरासुरनाथो वै मम च प्रपितामहः॥ ५३<br>करिष्ये त्वद्वचो देव एष मुक्तः शतक्रतुः।<br>तपसे मे रतिर्देव निर्विघ्नं चैव मे भवेत्॥ ५४<br>त्वत्प्रसादेन भगवन्नित्युक्त्वा विरराम सः।<br>तस्मिंस्तूष्णीं स्थिते दैत्ये प्रोवाचेदं पितामहः॥ ५५वहाँ (इन्द्रको बँधा हुआ) देखकर ब्रह्मा और कश्यपने उस वज्राङ्गसे इस प्रकार कहा—'पुत्र! इन देवराजको छोड़ दे। इनको बाँधने अथवा मारनेसे तेरा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा? बेटा! सम्मानित पुरुषका अपमान ही उसकी मृत्युसे बढ़कर बतलाया गया है। हमलोगोंके कहनेसे जो बन्धनमुक्त हो रहा है, उसे तू मरा हुआ ही जान। वत्स! दूसरेके गौरवसे मुक्त हुआ मनुष्य शत्रुओंका भारवाही अर्थात् आभारी हो जाता है। उसे दिन-प्रतिदिन जीते हुए मृतक-तुल्य ही समझना चाहिये। शत्रुके वशमें आ जानेपर महान् पुरुषोंका शत्रुके प्रति वैरभाव नहीं रह जाता।' यह सुनकर वज्राङ्ग विनम्र होकर कहने लगा—'देव! इन्द्रको बाँधनेसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। यह तो मैंने माताकी आज्ञाका पालन किया है। आप तो देवताओं और असुरोंके स्वामी तथा मेरे प्रपितामह हैं, अतः मैं अवश्य आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। यह लीजिये, इन्द्र बन्धन-मुक्त हो गये। देव! मेरे मनमें तपस्या करनेके लिये बड़ी लालसा है। भगवन्! वह आपकी कृपासे निर्विघ्न पूरा हो जाय।' ऐसा कहकर वह चुप हो गया। तब उस दैत्यको चुपचाप सामने स्थित देखकर ब्रह्मा इस प्रकार बोले—॥ ४९–५५॥
ब्रह्मोवाचब्रह्माने कहा—
तपस्त्वं क्रूरमापन्नो ह्यस्मच्छासनसंस्थितः।<br>अनया चित्तशुद्ध्या ते पर्याप्तं जन्मनः फलम्॥ ५६बेटा! (तूने) जो मेरी आज्ञाका पालन किया है, यही मानो तूने घोर तप कर लिया। इस चित्तशुद्धिसे तुझे अपने जन्मका फल प्राप्त हो गया। ऐसा
इत्युक्त्वा पद्मजः कन्यां ससर्जायतलोचनाम्।<br>तामस्मै प्रददौ देवः पत्न्यर्थं पद्मसंभवः॥ ५७<br>वराङ्गीति च नामास्याः कृत्वा यातः पितामहः।<br>वज्राङ्गोऽपि तया सार्धं जगाम तपसे वनम्॥ ५८कहकर पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने एक विशाल नेत्रोंवाली कन्याकी सृष्टि की और उसे वज्राङ्गको पत्नीरूपमें प्रदान कर दिया। पुनः उस कन्याका वराङ्गी नाम रखकर ब्रह्मा वहाँसे चले गये। तत्पश्चात् वज्राङ्ग भी अपनी पत्नी वराङ्गीके साथ तपस्या करनेके लिये वनमें