मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
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* मत्स्यपुराण *
| दोग्धा वररुचिर्नाम नाट्यवेदह्रास्य पारगः।<br>गिरिभिर्वसुधा दुग्धा रत्नानि विविधानि च॥ २५<br>औषधानि च दिव्यानि दोग्धा मेरुर्महाचलः।<br>वत्सोऽभूद्धिमवांस्तत्र पात्रं शैलमयं पुनः॥ २६<br>वृक्षैश्च वसुधा दुग्धा क्षीरं छिन्नप्ररोहणम्।<br>पालाशपात्रे दोग्धा तु शालः पुष्पलताकुलः॥ २७<br>प्लक्षोऽभवत्ततो वत्सः सर्ववृक्षधनाधिपः।<br>एवमन्यैश्च वसुधा तदा दुग्धा यथेप्सितम्॥ २८<br>आयुर्धनानि सौख्यं च पृथौ राज्यं प्रशासति।<br>न दरिद्रस्तदा कश्चिन्न रोगी न च पापकृत्॥ २९<br>नोपसर्गभयं किञ्चित् पृथौ राजनि शासति।<br>नित्यं प्रमुदिता लोका दुःखशोकविवर्जिताः॥ ३०<br>धनुष्कोट्या च शैलेन्द्रानुत्सार्य स महाबलः।<br>भुवस्तलं समं चक्रे लोकानां हितकाम्यया॥ ३१<br>न पुरग्रामदुर्गाणि न चायुधधरा नराः।<br>क्षयातिशयदुःखं च नार्थशास्त्रस्य चादरः॥ ३२<br>धर्मैकवासना लोकाः पृथौ राज्यं प्रशासति।<br>कथितानि च पात्राणि यत् क्षीरं च मया तव॥ ३३<br>येषां यत्र रुचिस्तत्तद् देयं तेभ्यो विजानता।<br>यज्ञश्राद्धेषु सर्वेषु मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ३४<br>दुहितृत्वं गता यस्मात् पृथोर्धर्मवतो मही।<br>तदानुरागयोगाच्च पृथिवी विश्रुता बुधैः॥ ३५ | उस कार्यमें नाट्य-वेदका पारगामी विद्वान् वररुचि नामक गन्धर्व दुहनेवाला था। पर्वतोंने पृथ्वीसे अनेक प्रकारके रत्नों और दिव्य ओषधियोंका दोहन किया। उसमें महाचल सुमेरु दुहनेवाला, हिमवान् बछड़ा और पात्र शैलमय था। वृक्षोंने पृथ्वीसे पलाशपत्रके पात्रमें (टहनी आदिके) कटनेके बाद पुनः उगनेवाला दूध दुहा। उस समय पुष्प और लताओंसे लदा हुआ शालवृक्ष दुहनेवाला था और समृद्धिशाली एवं सर्ववृक्षमय पाकड़का वृक्ष बछड़ा बना था। इसी प्रकार अन्यान्य वर्गके प्राणियोंने भी उस समय अपने-अपने इच्छानुसार पृथ्वीका दोहन किया था॥ १६—२८॥<br>महाराज पृथुके राज्यमें प्रजा दीर्घायु, धन-धान्य एवं सुख-समृद्धिसे सम्पन्न थी। उस समय न कोई दरिद्र था, न रोगी और न कोई पाप-कर्म ही करता था। महाराज पृथुके शासनकालमें किसी उपसर्ग (आधिदैविक एवं आधिभौतिक उपद्रव)-का भय नहीं था। लोग दुःख-शोकसे रहित होकर सदा सुखमय जीवनयापन करते थे। उन महाबली पृथुने प्रजाओंकी हितकामनासे प्रेरित होकर अपने धनुषकी कोटिसे बड़े-बड़े पर्वतोंको उखाड़कर पृथ्वीके धरातलको समतल कर दिया था। पृथुके राज्यकालमें न तो पुर, ग्राम और दुर्ग थे, न मनुष्य अस्त्र-शस्त्र धारण करते थे। (उस समय आत्मरक्षाके लिये इनकी कोई आवश्यकता न थी।) रोगोंका सर्वथा अभाव था। क्षय-विनाश एवं सातिशयता—परस्परकी विषमताका दुःख* उन्हें नहीं देखना पड़ता था। प्रजाओंमें अर्थशास्त्रके प्रति आदर नहीं था, अर्थात् लोभका चिह्नमात्र भी नहीं था। उनमें एकमात्र धर्मकी ही वासना थी। ऋषियो! इस प्रकार मैंने आपसे पृथ्वीके दोहनपात्रोंका तथा जैसा-जैसा दूध दुहा गया था, उसका भी वर्णन किया। उनमें जिस वर्गके प्राणियोंकी जिस पदार्थकी प्राप्तिकी रुचि हो, उसे वही पदार्थ यज्ञों और श्राद्धोंमें अर्पित करना चाहिये। इस प्रकार यह पृथ्वी-दोहनका प्रसङ्ग मैंने तुम्हें सुना दिया। यतः पृथ्वी धर्मात्मा पृथुकी कन्या बन चुकी थी, अतः पृथुके अतिशय अनुरागके कारण विद्वानोंद्वारा 'पृथ्वी' नामसे कही जाने लगी॥२९—३५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वैन्याभिवर्णनो नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वैन्याभिवर्णन नामक दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०॥
* इसे विस्तारसे समझनेके लिये योगवासिष्ठ १।१।३०—४० देखना चाहिये।