मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context- अध्याय १० * | ४३
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| दग्धुमेवोद्यतः कोपाच्छरेणामितविक्रमः।<br>ततो गोरूपमास्थाय भूः पलायितुमुद्यता ॥ १२<br><br>पृष्ठतोऽनुगतस्तस्याः पृथुर्दीप्तशरासनः।<br>ततः स्थित्वैकदेशे तु किं करोमीति चाब्रवीत् ॥ १३<br><br>पृथुरप्यवदद् वाक्यमीप्सितं देहि सुव्रते।<br>सर्वस्य जगतः शीघ्रं स्थावरस्य चरस्य च ॥ १४<br><br>तथैव साब्रवीद् भूमिर्दुदोह स नराधिपः।<br>स्वके पाणौ पृथुर्वत्सं कृत्वा स्वायम्भुवं मनुम् ॥ १५<br><br>तदन्नमभवच्छुद्धं प्रजा जीवन्ति येन वै।<br>ततस्तु ऋषिभिर्दुग्धा वत्सः सोमस्तदाभवत् ॥ १६<br><br>दोग्धा बृहस्पतिर्भूत् पात्रं वेदस्तपो रसः।<br>देवैश्च वसुधा दुग्धा दोग्धा मित्रस्तदाभवत् ॥ १७<br><br>इन्द्रो वत्सः समभवत् क्षीरमूर्जस्करं बलम्।<br>देवानां काञ्चनं पात्रं पितॄणां राजतं तथा ॥ १८<br><br>अन्तकश्चाभवद् दोग्धा यमो वत्सः स्वधा रसः।<br>अलाबुपात्रं नागानां तक्षको वत्सकोऽभवत् ॥ १९<br><br>विषं क्षीरं ततो दोग्धा धृतराष्ट्रोऽभवत् पुनः।<br>असुरैरपि दुग्धेयमायसे शक्रपीडिनीम् ॥ २०<br><br>पात्रे मायामभूद् वत्सः प्रह्लादिस्तु विरोचनः।<br>दोग्धा द्विमूर्धा तत्रासीन्माया येन प्रवर्तिता ॥ २१<br><br>यक्षैश्च वसुधा दुग्धा पुरान्तर्धानमीप्सुभिः।<br>कृत्वा वैश्रवणं वत्समामपात्रे महीपते ॥ २२<br><br>प्रेतरक्षोगणैर्दुग्धा धारारुधिरमुल्बणम्।<br>रौप्यनाभोऽभवद् दोग्धा सुमाली वत्स एव तु ॥ २३<br><br>गन्धर्वैश्च पुरा दुग्धा वसुधा साप्सरोगणैः।<br>वत्सं चैत्ररथं कृत्वा गन्धान् पद्मदले तथा ॥ २४ | क्रुद्ध हो उठे और धनुषपर बाण चढ़ाकर उसे भस्म कर देनेके लिये उद्यत हो गये। यह देखकर भूमि (भयभीत होकर) गौका रूप धारणकर भाग चली। इधर प्रचण्ड धनुर्धर पृथु भी उसके पीछे दौड़ पड़े। (इस प्रकार पृथुको पीछा करते देख वह गौरूपा भूमि हताश होकर) एक स्थानपर खड़ी हो गयी और बोली '(नाथ! आपकी प्रसन्नताके लिये) मैं क्या करूँ?' तब पृथुने ऐसी बात कही—'सुव्रते! तुम शीघ्र ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को मनोवाञ्छित वस्तुएँ प्रदान करो।' यह सुनकर पृथ्वी बोली—'अच्छा, ऐसा ही होगा।' (इस प्रकार पृथ्वीकी अनुमति जानकर) उन नरेश्वर पृथुने स्वायम्भुव मनुको बछड़ा बनाकर अपनी हथेलीमें गौरूपी पृथ्वीका दोहन किया। वह दुहा हुआ पदार्थ शुद्ध अन्न हुआ, जिससे प्रजाका जीवन-निर्वाह होता है॥ ३—१५ १/२॥<br><br>(फिर क्या था? अब तो दोहनकी शृङ्खला ही चल पड़ी) पुनः ऋषियोंने भी उस पृथ्वीको दुहा। उस समय चन्द्रमा बछड़ा, दुहनेवाले महर्षि बृहस्पति, पात्र वेद और दुहा गया पदार्थ तप हुआ। देवताओंने भी पृथ्वीका दोहन किया। उस समय दुहनेवाले मित्र (देवता), इन्द्र बछड़ा तथा क्षीर (दुहा गया रस) ऊर्जस्वी बल हुआ। उस दोहनमें देवताओंका पात्र स्वर्णमय था। अन्तकने भी पृथ्वीका दोहन किया, उसमें यमराज बछड़ा बने और स्वधा रस था। पितरोंका पात्र रजतमय था। नागोंके दोहनमें नागराज धृतराष्ट्र दुहनेवाले, नागराज तक्षक बछड़ा, पात्र तुम्बी और क्षीर—दुहा हुआ पदार्थ—विष था। असुरोंद्वारा भी इस पृथ्वीका दोहन किया गया था। उन्होंने लौहमय पात्रमें इन्द्रको पीड़ित करनेवाली मायाको दुहा। उस कार्यमें प्रह्लाद-पुत्र विरोचन बछड़ा और मायाका प्रवर्तक द्विमूर्धा दुहनेवाला था। महीपते! यक्षोंको अन्तर्धान-विद्याकी अभिलाषा थी, अतः उन्होंने कुबेरको बछड़ा बनाकर कच्चे पात्रमें पृथ्वीका दोहन किया था। प्रेतों और राक्षसोंनें पृथ्वीसे भयंकर रुधिरकी धाराका दोहन किया। उसमें रौप्यनाभ नामक प्रेत दुहनेवाला और सुमाली नामक प्रेत बछड़ा बना था। अप्सराओंके साथ गन्धर्वोंने भी पूर्वकालमें चैत्ररथको बछड़ा बनाकर कमलके पत्तेमें पृथ्वीसे सुगन्धोंका दोहन किया था; |