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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 529 of 1098

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Page 529

* अध्याय १४२ * । ५९९


| वर्णाश्रमव्यवस्थानामेषां ब्रह्मा तथाकरोत्।<br>संहिताश्च तथा मन्त्रा आरोग्यं धर्मशीलता॥ ५५<br><br>संहिताश्च तथा मन्त्रा ऋषिभिर्ब्रह्मणः सुतैः।<br>यज्ञः प्रवर्तितश्चैव तदा ह्येव तु दैवतैः॥ ५६<br><br>यामैः शुक्लैर्जयैश्चैव सर्वसाधनसम्भृतैः।<br>विश्वसृग्भिस्तथा सार्धं देवेन्द्रेण महौजसा।<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे देवैस्ते यज्ञाः प्राक् प्रवर्तिताः॥ ५७<br><br>सत्यं जपस्तपो दानं पूर्वधर्मो य उच्यते।<br>यदा धर्मस्य ह्रसते शाखाधर्मस्य वर्धते॥ ५८<br><br>जायन्ते च तदा शूरा आयुष्मन्तो महाबलाः।<br>न्यस्तदण्डा महायोगा यज्वानो ब्रह्मवादिनः॥ ५९<br><br>पद्मपत्रायताक्षाश्च पृथुवक्त्राः सुसंहताः।<br>सिंहोरस्का महासत्त्वा मत्तमातङ्गगामिनः॥ ६०<br><br>महाधनुर्धराश्चैव त्रेतायां चक्रवर्तिनः।<br>सर्वलक्षणपूर्णास्ते न्यग्रोधपरिमण्डलाः॥ ६१<br><br>न्यग्रोधौ तु स्मृतौ बाहू व्यामो न्यग्रोध उच्यते।<br>व्यामेनैवोच्छ्रयो यस्य सम ऊर्ध्वं तु देहिनः।<br>समुच्छ्रयपरिणाहो न्यग्रोधपरिमण्डलः॥ ६२<br><br>चक्रं रथो मणिर्भार्या निधिरश्वो गजस्तथा।<br>प्रोक्तानि सप्त रत्नानि सर्वेषां चक्रवर्तिनाम्॥ ६३<br><br>चक्रं रथो मणिः खड्गं धनू रत्नं च पञ्चमम्।<br>केतुर्निधिश्च पञ्चैते प्राणहीनाः प्रकीर्तिताः॥ ६४<br><br>विष्णोरंशेन जायन्ते पृथिव्यां चक्रवर्तिनः।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु ह्यतीतानागतेषु वै॥ ६५<br><br>भूतभव्यानि यानीह वर्तमानानि यानि च।<br>त्रेतायुगानि तेष्वत्र जायन्ते चक्रवर्तिनः॥ ६६<br><br>भद्राणीमानि तेषां च विभाव्यन्ते महीक्षिताम्।<br>अत्यद्भुतानि चत्वारि बलं धर्मं सुखं धनम्॥ ६७<br><br>अन्योन्यस्याविरोधेन प्राप्यन्ते नृपतेः समम्।<br>अर्थो धर्मश्च कामश्च यशो विजय एव च॥ ६८ | ब्रह्माने स्वयं इनके लिये वर्णाश्रमकी व्यवस्था की थी तथा ब्रह्माके मानसिक पुत्र ऋषियोंद्वारा संहिताओं, मन्त्रों, नीरोगता और धर्मपरायणताका विधान किया गया था। उसी समय देवताओंने यज्ञकी भी प्रथा प्रचलित की थी। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सम्पूर्ण यज्ञिय साधनोंसहित याम, शुक्ल, जय, विश्वसृज् तथा महान् तेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ देवताओंने सर्वप्रथम इन यज्ञोंका प्रचार किया था। उस समय सत्य, जप, तप और दान—ये ही प्रारम्भिक धर्म कहलाते थे। जब इन धर्मोंका ह्रास प्रारम्भ होता था और अधर्मकी शाखाएँ बढ़ने लगती थीं, तब त्रेतायुगमें ऐसे शूरवीर चक्रवर्ती सम्राट् उत्पन्न होते थे, जो दीर्घायुसम्पन्न, महाबली, दण्ड देनेवाले, महान् योगी, यज्ञपरायण और ब्रह्मनिष्ठ थे, जिनके नेत्र कमलदलके समान विशाल और सुन्दर, मुख भरे-पूरे और शरीर सुसंगठित थे, जिनकी छाती सिंहके समान चौड़ी थी, जो महान् पराक्रमी और मतवाले गजराजकी भाँति चलनेवाले और महान् धनुर्धर थे, वे सभी राजलक्षणोंसे परिपूर्ण तथा न्यग्रोध (बरगद-) सदृश मण्डलवाले थे। यहाँ दोनों बाहुओंको ही न्यग्रोध कहा जाता है तथा व्योममें फैलायी हुई बाहुओंका मध्यभाग भी न्यग्रोध कहलाता है। उस व्योमकी ऊँचाई और विस्तारवाला 'न्यग्रोधपरिमण्डल' कहलाता है, अतः जिस प्राणीका शरीर व्योमके बराबर ऊँचा और विस्तृत हो, उसे न्यग्रोधपरिमण्डल* कहा जाता है। पूर्वकालके स्वायम्भुव मन्वन्तरमें चक्र (शासन, आज्ञाद भी), रथ, मणि, भार्या, निधि, अश्व और गज—ये सातों (चल-) रत्न कहे गये हैं। दूसरा चक्र (अचल) रथ, मणि, खड्ग, धनुष, रत्न, झंडा और खजाना—ये स्थिर (अचल) सप्तरत्न हैं। (सब मिलकर ये ही राजाओंके चौदह रत्न हैं।) बीते हुए एवं आनेवाले सभी मन्वन्तरोंमें भूतलपर चक्रवर्ती सम्राट् विष्णुके अंशसे उत्पन्न होते हैं॥ ५३—६५॥<br><br>इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमानमें जितने त्रेतायुग हुए होंगे और हैं, उन सभीमें चक्रवर्ती सम्राट् उत्पन्न होते हैं। उन भूपालोंके बल, धर्म, सुख और धन—ये चतुर्भद्र चारों अत्यन्त अद्भुत और माङ्गलिक होते हैं। उन राजाओंको अर्थ, धर्म, काम, यश और विजय—ये सभी समानरूपसे परस्पर अविरोध भावसे प्राप्त होते हैं। |


* वाल्मीकीय रामायण ३। ३५ तथा भट्टिकाव्य ५ में सीताजीको 'न्यग्रोधपरिमण्डला' कहा गया है।