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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 528 of 1098

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Page 528
५१८* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
अथ त्रेतायुगस्यादौ मनुः सप्तर्षयश्च ये।<br>श्रौतस्मार्तं ब्रुवन् धर्मं ब्रह्मणा तु प्रचोदिताः ॥ ४०<br>दाराग्निहोत्रसम्बन्धमृग्यजुःसामसंहिताः ।<br>इत्यादिबहुलं श्रौतं धर्मं सप्तर्षयोऽब्रुवन् ॥ ४१<br>परम्परागतं धर्मं स्मार्तं त्वाचारलक्षणम्।<br>वर्णाश्रमाचारयुतं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ४२<br>सत्येन ब्रह्मचर्येण श्रुतेन तपसा तथा।<br>तेषां सुतप्ततपसामार्षेणानुक्रमेण ह ॥ ४३<br>सप्तर्षीणां मनोश्चैव आदौ त्रेतायुगे ततः।<br>अबुद्धिपूर्वकं तेन सकृत्पूर्वकमेव च ॥ ४४<br>अभिवृत्तास्तु ते मन्त्रा दर्शनैस्तारकादिभिः।<br>आदिकल्पे तु देवानां प्रादुर्भूतास्तु ते स्वयंम् ॥ ४५<br>प्रमाणेष्वथ सिद्धानामन्येषां च प्रवर्तते।<br>मन्त्रयोगो व्यतीतेषु कल्पेष्वथ सहस्रशः।<br>ते मन्त्रा वै पुनस्तेषां प्रतिमायामुपस्थिताः ॥ ४६<br>ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्राश्चाथर्वणास्तु ये।<br>सप्तर्षिभिश्च ये प्रोक्ताः स्मार्तं तु मनुरब्रवीत् ॥ ४७<br>त्रेतादौ संहता वेदाः केवलं धर्मसेतवः।<br>संरोधादायुषश्चैव व्यस्यन्ते द्वापरे च ते।<br>ऋषयस्तपसा वेदानहोरात्रमधीयत ॥ ४८<br>अनादिनिधना दिव्याः पूर्वं प्रोक्ताः स्वयम्भुवा।<br>स्वधर्मसंवृताः साङ्गा यथाधर्मं युगे युगे।<br>विक्रियन्ते स्वधर्मं तु वेदवादाद् यथायुगम् ॥ ४९<br>आरम्भयज्ञः क्षत्रस्य हविर्यज्ञा विशः स्मृताः।<br>परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञाश्च ब्राह्मणाः ॥ ५०<br>ततः समुदिता वर्णास्त्रेतायां धर्मशालिनः।<br>क्रियावन्तः प्रजावन्तः समृद्धाः सुखिनश्च वै ॥ ५१<br>ब्राह्मणाश्चैव विधीयन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियैर्विशः।<br>वैश्याश्शूद्रानुवर्तन्ते परस्परमनुग्रहात् ॥ ५२<br>शुभाः प्रकृतयस्तेषां धर्मा वर्णाश्रमाश्रयाः॥त्रेतायुगके आदिमें जो मनु और सप्तर्षिगण थे, उन लोगोंने ब्रह्माकी प्रेरणासे श्रौत और स्मार्त धर्मोंका वर्णन किया था। उस समय सप्तर्षियोंने दार-सम्बन्ध (विवाह), अग्निहोत्र, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी संहिता आदि अनेकविध श्रौत धर्मोंका विवेचन किया था। उसी प्रकार स्वायम्भुव मनुने वर्णों एवं आश्रमोंके धर्मोंसे युक्त परम्परागत आचार-लक्षणरूप स्मार्त-धर्मका वर्णन किया था। त्रेतायुगके आदिमें उत्कृष्ट तपस्यावाले उन सप्तर्षियों तथा मनुके हृदयमें वे मन्त्र सत्य, ब्रह्मचर्य, शास्त्र-ज्ञान, तपस्या तथा ऋषि-परम्पराके अनुक्रमसे बिना सोचे-विचारे ही दर्शनों एवं तारकादिद्वारा एक ही बारमें स्वयं प्रकट हो गये थे। वे ही मन्त्र आदि कल्पमें देवताओंके हृदयोंमें स्वयं उद्भूत हुए थे। वह मन्त्रयोग हजारों गत-कल्पोंमें सिद्धों तथा अन्यान्य लोगोंके लिये भी प्रमाणरूपमें प्रयुक्त होता था। वे मन्त्र पुनः उन देवताओंकी प्रतिमाओंमें भी उपस्थित हुए। इस प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-सम्बन्धी जो मन्त्र हैं, वे सप्तर्षियोंद्वारा कहे गये हैं। स्मार्तधर्मका वर्णन तो मनुने किया है। त्रेतायुगके आदिमें ये सभी वेद धर्मके सेतु-स्वरूप थे, किंतु द्वापरयुगमें आयुके न्यून हो जानेके कारण उनका विभाग कर दिया गया है। ऋषि अपने धर्मसे परिपूर्ण हैं। वे तपमें निरत हो रात-दिन वेदाध्ययन करते थे। ब्रह्माने सर्वप्रथम प्रत्येक युगमें युगधर्मानुसार इनका साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया है। वे योगानुकूल वेदवादसे स्खलित होकर अपने धर्मसे विकृत हो जाते हैं। त्रेतायुगमें ब्राह्मणोंका धर्म जपयज्ञ, क्षत्रियोंका यज्ञारम्भ, वैश्योंका हविर्यज्ञ और शूद्रोंका सेवायज्ञ कहा जाता था। उस समय सभी वर्णके लोग उन्नत, धर्मात्मा, क्रियानिष्ठ, संतानयुक्त, समृद्ध और सुखी थे। परस्पर प्रेमपूर्वक ब्राह्मण क्षत्रियोंके लिये और क्षत्रिय वैश्योंके लिये सब प्रकारका विधान करते थे तथा शूद्र वैश्योंका अनुवर्तन करते थे। उनके स्वभाव सुन्दर थे तथा उनके धर्म वर्ण एवं आश्रमके अनुकूल होते थे॥४०-५२१/२॥
संकल्पितेन मनसा वाचा वा हस्तकर्मणा।<br>त्रेतायुगे ह्यविकले कर्मारम्भः प्रसिद्ध्यति ॥ ५३<br>आयु रूपं बलं मेधा आरोग्यं धर्मशीलता।<br>सर्वसाधारणं ह्येतदासीत् त्रेतायुगे तु वै ॥ ५४समूचे त्रेतायुगके कार्यकालमें मानसिक संकल्प, वचन और हाथसे प्रारम्भ किये गये कर्म सिद्ध होते थे। त्रेतायुगमें आयु, रूप, बल, बुद्धि, नीरोगता और धर्मपरायणता—ये सभी गुण सर्वसाधारण लोगोंमें भी विद्यमान थे।