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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 523 of 1098

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Page 523
* अध्याय १४१ *५१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इत्येते पितरो देवाः सोमपाः सोमवर्धनाः।<br>आर्तवा ऋतवोऽथाब्दा देवास्तान्भावयन्ति हि ॥ ५७क्षय बतलाया है। इस प्रकार ये सोमपायी देव-पितर सोमकी वृद्धि करनेवाले हैं और ऋतु एवं अब्दसे सम्बन्धित आर्तवसंज्ञक देवगण उन्हींके परिपोषक हैं ॥४३—५७॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि पितॄञ्श्राद्धभुजस्तु ये।<br>तेषां गतिं च सत्तत्त्वं प्राप्तिं श्राद्धस्य चैव हि ॥ ५८इसके बाद अब मैं जो श्राद्धभोजी पितर हैं, उनकी गति, उनका उत्तम तत्त्व तथा उनके निमित्त दिये गये श्राद्धकी प्राप्तिका वर्णन कर रहा हूँ।
न मृतानां गतिः शक्या ज्ञातुं वा पुनरागतिः।<br>तपसा हि प्रसिद्धेन किं पुनर्मांसचक्षुषा ॥ ५९मृतकोंके आवागमनका रहस्य तो उत्कृष्ट तपोबलसम्पन्न तपस्वी भी नहीं जान सकते, फिर चर्मचक्षुधारी साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है।
अत्र देवान्पितॄंश्चैते पितरो लौकिकाः स्मृताः।<br>तेषां ते धर्मसामर्थ्यात्स्मृताः सायुज्यगा द्विजैः ॥ ६०<br><br>यदि वाश्रमधर्मेण प्रज्ञानेषु व्यवस्थितान्।<br>अन्ये चात्र प्रसीदन्ति श्रद्धायुक्तेषु कर्मसु ॥ ६१इन श्राद्धभोजियोंमें देवता और पितर दोनों हैं। इनमें जो अपने धर्मके बलसे सायुज्य मुक्तिको प्राप्त कर चुके हैं अथवा आश्रमधर्मका पालन करते हुए ज्ञान-प्राप्तिमें लगे हुए हैं और श्रद्धायुक्त कर्मोंके सम्पन्न होनेपर प्रसन्न होते हैं, उन्हें महर्षिगण लौकिक पितर कहते हैं।
ब्रह्मचर्येण तपसा यज्ञेन प्रजया भुवि।<br>श्राद्धेन विद्यया चैव चान्नदानेन सप्तधा ॥ ६२<br><br>कर्मस्वेवेषु ये सक्ता वर्तन्त्या देहपातनात्।<br>देवैस्ते पितृभिः सार्धमूमपैः सोमपैस्तथा।<br>स्वर्गता दिवि मोदन्ते पितृमन्त उपास्ते ॥ ६३ब्रह्मचर्य, तप, यज्ञ, संतान, श्राद्ध, विद्या और अन्नदान—ये भूतलपर प्रधान धर्म कहे गये हैं। जो लोग मृत्युपर्यन्त इन सातों धर्मोंका पालन करते हुए इनमें आसक्त रहते हैं, वे ऊष्मप तथा सोमप देवताओं और पितरोंके साथ स्वर्गलोकमें जाकर आनन्दका उपभोग करते हुए पितरोंकी उपासना करते हैं।
प्रजावतां प्रसिद्ध्यैषा उक्ता श्राद्धकृतां च वै।<br>तेषां निवापे दत्तं हि तत्कुलीनैस्तु बान्धवैः ॥ ६४ऐसी प्रसिद्धि उन संतानयुक्त श्राद्धकर्ताओंके लिये कही गयी है, जिनके लिये उनके कुलीन भाई-बन्धुओंने दानके अवसरपर श्राद्ध आदि प्रदान किया है।
मासश्राद्धं हि भुञ्जानास्तेऽप्येते सोमलौकिकाः।<br>एते मनुष्याः पितरो मासश्राद्धभुजस्तु वै ॥ ६५मासिक श्राद्धमें भोजन करनेवाले पितर चन्द्रलोकवासी हैं। ये मासश्राद्धभोजी पितर मनुष्योंके पितर हैं।
तेभ्योऽपरे तु ये त्वन्ये सङ्कीर्णाः कर्मयोनिषु।<br>भ्रष्टाश्चाश्रमधर्मेषु स्वधास्वाहाविवर्जिताः ॥ ६६<br><br>भिन्ने देहे दुरापन्नाः प्रेतभूता यमक्षये।<br>स्वकर्मण्यनुशोचन्तो यातनास्थानमागताः ॥ ६७इनके अतिरिक्त जो अन्य लोग कर्मानुसार प्राप्त हुई योनियोंमें कष्ट झेल रहे हैं, आश्रमधर्मसे भ्रष्ट हो गये हैं, जिनके लिये स्वाहा-स्वधाका प्रयोग हुआ ही नहीं है, जो शरीरके नष्ट होनेपर यमलोकमें प्रेत होकर दुर्गति भोग रहे हैं, नरक-स्थानपर पहुँचकर अपने कर्मोंपर पश्चात्ताप करते हैं,
दीर्घाश्चैवातिशुष्काश्च श्मश्रुलाश्च विवाससः।<br>क्षुत्पिपासाभिभूतास्ते विद्रवन्ति त्वितस्ततः ॥ ६८<br><br>सरित्सरस्तडागानि पुष्करिण्यश्च सर्वशः।<br>परान्नान्यभिकाङ्क्षन्तः काल्यमाना इतस्ततः ॥ ६९लम्बे शरीरवाले, अत्यन्त कृशकाय, लम्बी दाढ़ियोंसे युक्त, वस्त्रहीन और भूख एवं प्याससे व्याकुल होकर इधर-उधर दौड़ते हैं, नदी, सरोवर, तडाग और जलाशयोंपर सब ओर दूसरोंके द्वारा दिये गये अन्नकी ताकमें इधर-उधर घूमते रहते हैं,
स्थानेषु पात्यमाना ये यातनास्थेषु तेषु वै।<br>शाल्मल्यां वैतरण्यां च कुम्भीपाकेऽद्धवालुके ॥ ७०<br><br>असिपत्रवने चैव पात्यमानाः स्वकर्मभिः।<br>तत्रस्थानां तु तेषां वै दुःखितानामशायिनाम् ॥ ७१शाल्मली, वैतरणी, कुम्भीपाक, तप्तवालुका और असिपत्रवन नामक भीषण नरकोंमें अपने कर्मानुसार गिराये जाते हैं तथा उन नरकोंमें पड़े हुए जो निद्रारहित हो दुःख भोग रहे हैं,