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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 522 of 1098

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Page 522

५१२ * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
द्वौ द्वौ लवावमावास्यां स कालः पर्वसंधिषु ।<br>द्व्यक्षरः कुहुमात्रश्च पर्वकालस्तु स स्मृतः ॥ ४४<br>दृष्टचन्द्रा त्वमावास्या मध्याह्नप्रभृतीह वै ।<br>दिवा तदूर्ध्वं रात्र्यां तु सूर्ये प्राप्ते तु चन्द्रमाः ।<br>सूर्येण सहसोद्गच्छेत्ततः प्रातस्तनात्तु वै ॥ ४५<br>समागम्य लवौ द्वौ तु मध्याह्नान्निपतन् रविः ।<br>प्रतिपच्छुक्लपक्षस्य चन्द्रमाः सूर्यमण्डलात् ॥ ४६<br>निर्मुच्यमानयोर्मध्ये तयोर्मण्डलयोस्तु वै ।<br>स तदान्वाहुतेः कालो दर्शस्य च वषट्क्रियाः ।<br>एतदृतुमुखं ज्ञेयममावास्यां तु पार्वणम् ॥ ४७<br>दिवा पर्व त्वमावास्यां क्षीणेन्दौ धवले तु वै ।<br>तस्माद् दिवा त्वमावास्यां गृह्यते यो दिवाकरः ॥ ४८अमावास्यामें पर्वसंधिके अवसरपर दो-दो लव पर्वकाल कहलाते हैं। इनमें प्रतिपदाके योगवाला पर्वकाल कुहू कहलाता है। जिस दिन दोपहरतक अमावास्यामें चन्द्रमाका सम्पर्क बना रहे और उसके बाद रात्रिके प्राप्त होनेपर चन्द्रमा सहसा सूर्यके निकट पहुँच जायें, पुनः प्रातःकाल सूर्यमण्डलसे पृथक् हो जायँ तो शुक्लपक्षकी प्रतिपदामें प्रातःकाल दो लव पर्वकाल कहलाता है। इस प्रकार सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डलके पृथक् होते समय अमावास्याके उस मध्यवर्ती कालको अन्वाहुति कहते हैं। इसमें पितरोंके निमित्त वषट् क्रियाएँ की जाती हैं। इसे ऋतुमुख और अमावास्याको पार्वण जानना चाहिये। दिनमें जब क्षीण चन्द्रमा सूर्यके साथ मिलते हैं तब अमावास्याका वह काल पर्वकाल कहलाता है। इसीलिये दिनमें अमावास्याके उस पर्वकालमें सूर्यके पहुँचनेपर सूर्य गृहीत हो जाते हैं अर्थात् सूर्यग्रहण लगता है।
कुहेति कोकिलेनोक्तं यस्मात्कालात् समाप्यते ।<br>तत्कालसंज्ञिता ह्येषा अमावास्या कुहूः स्मृता ॥ ४९कोयलद्वारा उच्चरित ‘कुहू’ शब्द जितने समयमें समाप्त होता है, अमावास्याका उतना मुख्य काल ‘कुहू’ नामसे कहा जाता है।
सिनीवालीप्रमाणं तु क्षीणशेषो निशाकरः ।<br>अमावास्या विशत्यर्कं सिनीवाली तदा स्मृता ॥ ५०सिनीवालीका प्रमाण यह है कि जब क्षीण चन्द्रमा सूर्यमें प्रवेश करते हैं तब वह अमावास्या सिनीवाली कही जाती है।
अनुमतिश्च राका च सिनीवाली कुहूस्तथा ।<br>एतासां द्विलवः कालः कुहूमात्रा कुहूः स्मृता ॥ ५१<br>इत्येष पर्वसन्धीनां कालो वै द्विलवः स्मृतः ।<br>पर्वणां तुल्यकालस्तु तुल्याहुतिवषट्क्रियाः ॥ ५२अनुमति, राका, सिनीवाली और कुहू—इनका दो लवकाल पर्वकाल होता है। कुहू शब्दके उच्चारणपर्यन्त कालको कुहू कहते हैं। इस प्रकार पर्वसंधियोंका यह काल दो लवका बतलाया जाता है और यह पर्वोंके समान फलदायक होता है। इसमें हवन और वषट् क्रियाएँ की जाती हैं।
चन्द्रसूर्यव्यतीपाते समे वै पूर्णिमे उभे ।<br>प्रतिपत्प्रतिपन्नस्तु पर्वकालो द्विमात्रकः ॥ ५३चन्द्रमा और सूर्यका व्यतिपातपर स्थित होना तथा दोनों (अमावास्या और पूर्णिमा) पूर्णिमाएँ—ये सभी एक-से पुण्यदायक हैं। प्रतिपदाके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला पर्वकाल दो लवका होता है।
कालः कुहूसिनीवाल्यो समृद्धो द्विलवः स्मृतः ।<br>अर्कनिर्मण्डले सोमे पर्वकालः कलाः स्मृताः ॥ ५४इसी प्रकार कुहू और सिनीवालीके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ पर्वकाल भी दो लवका ही माना जाता है। चन्द्रमा जब सूर्यमण्डलसे बाहर होते हैं, तब वह पर्वकाल एक कलाका बतलाया जाता है।
यस्मादापूर्यते सोमः पञ्चदश्यां तु पूर्णिमा ।<br>दशभिः पञ्चभिश्चैव कलाभिर्दिवसक्रमात् ॥ ५५चूँकि दिनके क्रमसे पंद्रहवीं तिथिको चन्द्रमा पंद्रह कलाओंद्वारा पूर्ण किये जाते हैं, इसलिये उस तिथिको पूर्णिमा कहते हैं।
तस्मात् पञ्चदशे सोमे कला वै नास्ति षोडशी ।<br>तस्मात् सोमस्य विप्रोक्तः पञ्चदश्यां मया क्षयः ॥ ५६इस प्रकार चन्द्रमा पंद्रह कलाओंवाले* ही हैं, उनमें सोलहवीं कला नहीं है। इसी कारण मैंने पंद्रहवीं तिथिको चन्द्रमाका

* इसका विस्तृत वर्णन सूर्यसिद्धान्त, बृहत्संहिता आदिमें है। १६ वीं बीजकलासहित १५ ह्रास-वृद्धियुक्त कलाओंका वर्णन शारदातिलक आदिमें इस प्रकार है—‘अमृता मानदा नन्दा पूषा तुष्टि रतिर्धृतिः। शाशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा॥ पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः स्वरजाः कलाः।' (शारदातिलक २।१२-१३)